How to do Parivarta Janu Shirasana? ( परिवर्त जानु शिरासन कैसे करें? )


परिवृत्त जानु शिरासन -

  • दोनों पंजों के बीच लगभग एक मीटर की दूरी रखकर बैठ जाएँ। बायें घुटने को मोड़ें और एड़ी को मूलाधार के निकट रखें।
  • शरीर को दाहिनी ओर लाते हुए सामने की ओर झुकें और दाहिने हाथ से दाहिने पंजे को पकड़ें। उँगलियाँ पैर के तलवे के मध्य भाग के सम्पर्क में रहें और अँगूठा ऊपर रहे।
  • कोहनी को सीधे पैर के भीतरी भाग की ओर जमीन पर रखें। दाहिने कन्धे को नीचे लाते हुए, दाहिने पैर की ओर घुमायें।
  • बायीं भुजा को सिर के ऊपर से लाकर दाहिने पंजे को बायें हाथ से पकड़ें।
  • भुजाओं को संकुचित करते हुए दाहिने कन्धे को धीरे-धीरे दाहिने पंजे की ओर खींचें।
  • सिर को बायीं भुजा के नीचे आरामदायक स्थिति में रखें, पीठ को शिथिल करें।
  • धड़ को जितना सम्भव हो, इस प्रकार मोड़ें कि वक्ष फैला हुआ और सामने की ओर रहे।
  • जितनी देर आराम से हो सके, इस स्थिति में रुकें।
  • हाथों को ढीला करें, बायीं भुजा को सिर के ऊपर से नीचे लाते हुए धीरे-धीरे सीधे बैठने की स्थिति में लौट आयें।
  • इस क्रिया की पुनरावृत्ति दूसरी तरफ करें।

श्वसन-

पैरों की स्थिति को व्यवस्थित करते समय सामान्य श्वसन करें। धड़ को मोड़ते समय और भुजाओं एवं हाथों को सही स्थान पर रखते समय श्वास छोड़ें। उसके बाद श्वास लें। शरीर को बगल में खींचते समय श्वास छोड़ें। अन्तिम स्थिति में रुकते समय सामान्य श्वास लें। सीधे बैठने की स्थिति में वापस आते समय श्वास लें।

अवधि-

दोनों ओर एक-एक बार अभ्यास करें। यदि कभी असुविधा अनुभव हो, तो अभ्यास बन्द कर दें।

सजगता-

शारीरिक-शरीर के मोड़ और खिंचाव पर।

आध्यात्मिक-

मणिपुर चक्र पर।

क्रम-

इस आसन का अभ्यास आगे और पीछे की ओर झुकने वाले आसनों के बाद करना चाहिए। यह आगे की ओर झुकने के साथ मेरुदण्ड मोड़कर किया जाने वाला आसन है।

सीमायें-

गर्भवती स्त्रियों और पीठ-दर्द वाले व्यक्तियों को यह आसन नहीं करना चाहिए।

लाभ-

यह आसन शरीर के बगल, जाँघों के पीछे की माँसपेशियों और कन्धों के पीछे खिंचाव लाता है। यह एक साथ उदर की माँसपेशियों और अंगों को एक ओर संकुचित करता है और दूसरी ओर उनमें लाभकारी खिंचाव लाता है। यह ध्यान के आसनों में दीर्घ काल तक बैठने के लिए शरीर को तैयार करता है।

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