What is life? प्राण क्या है?
प्राणायाम के विषय में जानने से पूर्व प्राण क्या है? इसका अर्थ क्या है? इसका स्वरूप क्या है? यह जानना अत्यंत आवश्यक है। ऋषियों के अनुसार प्राण का अभिप्राय उसके शब्द के अर्थ से प्राप्त होता है- प्राण शब्द की व्युत्पत्ति 'प्र' उपसर्ग पूर्वक अन् (प्राणेन्) धातु से होती है। 'अन्' धातु का अर्थ जीवन शक्ति चेतना वाचक है। चेतना की जीवनी शक्ति को संकल्प बल के रूप में मापा गया है। अतः प्राण शब्द का अर्थ चेतना शक्ति है। प्रश्नोपनिषद् के अनुसार "प्राण की व्याख्या संकल्प के रूप में की गई है।" सूक्ष्म दृष्टि से प्राण का अर्थ ब्रह्मांड भर में व्याप्त एक ऐसी ऊर्जा है जो जड़ और चेतन दोनों का समन्वित रूप है। जीवधारियों की दो हलचलें- एक 'ज्ञानपरक' तथा दूसरी 'क्रियापरक' दोनों को ही गतिशील रखने के लिए संव्याप्त प्राण ऊर्जा से पोषण मिलता है। प्राण संपूर्ण सृष्टि का मूल संरक्षक तत्वह्नहै।
प्राण प्रजा अनुवस्ते पितापुत्रमिव प्रियम्।
प्राणो हसर्वश्चयेनवरो ॥
- अथर्ववेद 11/4/10
प्राण पिता है और उसके लिए सारे प्राणी प्रिय पुत्र की तरह हैं, प्राण संपूर्ण सृष्टि के ईश्वर है।
इस प्रकार से प्राण एक ऐसी शक्ति है जिसके सहारे इस सृष्टि या ब्रह्मांड के जड़ और चेतन अपने स्वरूपों में अच्छी तरह दिखाई देते हैं। प्राण की व्याख्या करना उतना ही कठिन है जितना कि ईश्वर की। प्राण एक ऐसी ऊर्जा है जो सभी स्तरों पर ब्रह्मांड में व्याप्त है। यह शारीरिक, मानसिक,बौद्धिक, आध्यात्मिक एवं ब्रह्मांडीय ऊर्जा है। यह एक ऐसी ऊर्जा है जो जन्म देती है, सुरक्षा करती है एवं नष्ट भी करती है।
Secrets of life ( प्राण के भेद )
योग ग्रंथों में शरीर की विभिन्न क्रियाओं को संचालित करने वाले प्राण तत्त्व को विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है।
प्राण को दो भागों में बाँटा गया है- (1) महाप्राण (2) उपप्राण। इन दोनों की अलग-अलग संख्या बताई गई है। आप्त पुरुषों ने प्राण को पाँच प्राणों तथा पाँच उप-प्राणों में विभाजित किया है।
पाँच प्राण- (1) प्राण, (2) अपान, (3) समान, (4) उदान, (5) व्यान हैं।
पांच उपप्राण- (1) नाग, (2) कूर्म, (3) हकृकल, (4) देवदत्त, (5) धनंजय हैं।
इसका वर्णन आयुर्वेद शास्त्र में इस प्रकार किया गया है-
(1) प्राण-जो श्वास, आहार आदि को खींचता है और शरीर में मल संचार करता है, वह प्राण है। शब्दोच्चार में प्रायः इसी की प्रमुखता रहती है।
(2) अपान-जो मलों को बाहर फेंकने की शक्ति से संपन्न है, वह अपान है। मल-मूत्र, स्वेद, कफ, वीर्य आदि का विसर्जन, भ्रूण का प्रसव आदि बाहर फेंकने वाली क्रियाएँ इसी अपान प्राण के बल से संपन्न होती हैं।
(3) समान-जो रसों को ठीक तरह यथा स्थान ले जाता है और वितरित करता है, वह समान है। पाचक रसों का उत्पादन और उनका स्तर उपयुक्त बनाए रखना इसी का काम है।
(4) उदान-जो शरीर को उठाए रखे, कड़क रखे, गिरने न दे वह उदान है। ऊर्ध्वगमन की अनेकों प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष क्रियाएँ इसी के द्वारा संपन्न होती हैं।
(5) व्यान-जो संपूर्ण शरीर में संव्याप्त है, वह व्यान है। रक्त संचार, श्वास-प्रश्वास, ज्ञान तंतु आदि के माध्यम से यह सारे शरीर पर नियंत्रण रखता है। अंर्तमन की स्वचालित शारीरिक गतिविधियाँ इसी के माध्यम से संपन्न होती हैं।
उपर्युक्त पाँच मुख्य प्राणों के साथ पाँच उप-प्राण उसी तरह जुड़े हैं जैसे मिनिस्टर के साथ सेकेट्री रहते हैं।
प्राण के साथ नाग, अपान के साथ कूर्म, समान के साथ कृकल, उदान के साथ देवदत्त और व्यान के साथ धनंजय का संबंध है।
कार्थ-उपप्राणों के कार्य निम्नांकित हैं-
(1) नाग-इसका कार्य वायु संचार, डकार, हिचकी, गुदा, वायु आदि है।
(2) कूर्म-इसका कार्य नेत्र का क्रिया-कलाप है।
(3) कृकल-इसका कार्य भूख, प्यास है।
(4) देवदत्त-इसका कार्य जैभाई, अंगड़ाई है।
(5) धनंजय-इसका कार्य हर अवयव की सफाई जैसे कार्यों के लिए उत्तरदायी बताया गया है, पर वस्तुतः यह इतने छोटे कार्यों तक सीमित नहीं है। मुख्य प्राणों की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित बनाए रखने में इनका पूरा योगदान रहता है। महा प्राणों को ओजस् व उप-प्राणों को तेजस् भी कहा गया है।
गीता के चौथे अध्याय के 29वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण प्राण की व्याख्या करते हुए अर्जुन से कहते हैं-
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापेरे।
प्राणापंगति रुद्ध्वा प्राणायामपरायणः ॥
कितने ही योगीजन अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, उसी प्रकार अन्य योगीजन प्राणवायु में अपानवायु को हवन करते हैं।
इसकी व्याख्या से स्पष्ट होता है कि जो श्वास बाहर से भीतर की ओर खींची जाती है वह प्राण कहलाती है और जो भीतर से बाहर की तरफ निकाली जाती है वह अपान कही जाती है। इस सिद्धांत के अनुसार पहले 'प्राण' को 'अपान' में हवन करना चाहिए अर्थात श्वास को सामान्य क्रम में बाहर निकाल देने की बजाए उसे भीतर रोककर अंतः कुंभक करना चाहिए। उसके पश्चात 'अपान' का 'प्राण' में हवन करना चाहिए अर्थात बाहर निकली श्वास को वहीं रोककर थोड़ी देर छाती खाली रहने देना चाहिए। ऐसा करने से बाह्य कुंभक होता है। जब फिर श्वास भीतर ली जाती है, तो वह फेफड़ों में भली प्रकार प्रवेश कर शरीर शुद्धि तथा मनःशक्ति के विकास का कार्य संपूर्ण सामर्थ्य के साथ करने लगती है।
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