Meaning and Definition of Hatha Yoga ( हठयोग की उत्पत्ति, अर्थ एवं परिभाषा )

                                                  हठयोग का अर्थ एवं महत्त्व के बारे में जान सकेंगे।
                                                  हठयोग की संपूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।

 भूमिका ( Role )

देवात्मा हिमालय की गहन उपत्यिकाओं में वैदिक ऋचाओं की गूँज के साथ ही योग की पुण्य परंपरा प्रारंभ हुई। सभ्यता की पहली किरण के साथ ही मानवीय जीवन में योग का प्रकाश प्रकाशितह्रहुआ। मननशील मानव ने अपने अस्तित्व की शुरूआत में ही यह अनुभव कर लिया था कि उसके जीवन में एक छोर पर पर यदि अनेकों सीमाएँ हैं, तो दूसरे छोर पर असीम और अनंत संभावनाएँ भी हैं। जिन्हें स्वयं को परिशोधित कर, परमात्मा के विराट् अस्तित्व में अपने को मिलाकर ही साकार किया जा सकता है। आत्म-परिशोधन और विराट् पुरूष से मिलन की यह प्रक्रिया ही योग है। प्राचीन ऋषियों की अपूर्व अंतदृष्टि, प्रतिभा एवं ज्ञान का मूल इसी में निहित है।

योग की महत्ता एवं इसमें बताई गई प्रक्रियाओं का वर्णन, श्रुति, स्मृति, व पुरार्णो में पर्याप्त रूप से मिलती है। ऋग्वेदिक काल को भारतीय संस्कृति के साथ समस्त मानव जाति का उद्गमकाल माना जाता है। वैदिक गोमुख से प्रवाहित हुई योग की यह पुण्य परम्परा महाभारत, भागवत पुराण, विष्णु पुराण, ब्राह्मण पुराण, यज्ञवल्क्य स्मृति एवं योगवासिष्ठ आदि ग्रंथों में भी प्रवाहमान हुई है।

वस्तुतः साधना चाहे किसी भी ढंग से की जाए, जब तक दैहिक आसक्ति से छुटकारा नहीं होता, मन समाहित नहीं हो पाता और मन के समाहित हुए बिना आत्मतत्व का स्फुरण संभव नहीं है। जिस किसी भी प्रकार मन समाहित हो, वही अवस्था समाधि है, योग है। योग का स्वरूप कहीं भी, किसी भी तरह वर्णित हो, परंतु प्रायः ये सभी पातंजल योग से ही निःसृत होते हैं।

महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग के साथ जिस योग ने मानव जाति को असंख्य आध्यात्मिक एवं अन्य उपलब्धियाँ प्रदान की हैं, उन्हीं में एक महत्त्वपूर्ण नाम है- हठयोग। यदि राजयोग को सुव्यवस्थित रूप देने का श्रेय महर्षि पतंजलि को जाता है, तो हठयोग को सुव्यवस्थित रूप प्रदान करने में निस्सदेह श्री स्वात्माराम जी ने सफल प्रयास किया है।

मैं उस ब्रह्म को कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ जो शरणागतों के समस्त भर्यो, दुःखों और कष्टों को नष्ट करने वाला है, जो अजन्मा होते हुए भी अपनी महानता से जन्म लेता हुआ प्रतीत होता है, जो अचल होते हुए भी चलायमान लगता है जो एक होते हुए भी (एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म) उन लोगों को अनेक रूप धारण किए प्रतीत होता है जिनकी दृष्टि अनंतविध मिथ्या दृश्यों को देखने से धुँधली पड़ गई है।

हे आदिनाथ भगवान शिव ! सर्वप्रथम मैं आपको प्रणाम करता हूँ जिन्होंने पार्वती जी को हठयोग की शिक्षा दी थी। जिसका प्रचार आगे चलकर श्री स्वामी मत्स्येंद्रनाथ एवं गोरक्षनाथ ने किया।

योग शब्दका अर्थ है-जीवात्मा तथा परमात्मा का मिलन। जो विद्या इस गुह्यज्ञान को प्राप्त करने का मार्ग बतलाती है, वह योगशास्त्र कहलाती है। योग को 4 मुख्य भागों या मार्गों के रूप में विकसित किया गया (1) राजयोग (2) हठयोग (3) मंत्रयोग (4) लययोग।







हठयोग का संबंध शरीर से एवं श्वास नियंत्रण से है तथा राजयोग मन से संबंधित है। हठयोग के बिना राजयोग और राजयोग के बिना हठयोग की सिद्धि नहीं हो सकती। राजयोग तथा हठयोग एक दूसरे के पूरक हैं। पूर्ण योगी बनने के लिए दोनों का व्यावहारिक ज्ञान होना आवश्यक है। जहाँ भली प्रकार से अभ्यास किए हुए हठयोग की समाप्ति होती है वहीं से राजयोग का शुभारंभ होता है। हठयोग राजयोग तक पहुँचने वाले योगाभ्यासियों के लिए एक सीढ़ी है।

हठं विना राजयोगो राजयोगं विना हठः।
न सिद्ध्यति ततो युग्ममानिष्पत्तेः समभ्यसेत् ॥

- हठप्रदीपिका 2/76

अतः निष्पत्ति अर्थात राजयोग की अवस्था प्राप्त होने तक इन दोनों का अभ्यास करते रहनाहचाहिए।  हठयोग स्वास्थ्य तथा दीर्घायु प्राप्त करने में सहायक है। इसके अभ्यास से हृदय, फेफड़ों, मस्तिष्क तथा पाचनतंत्र की क्रियाएँ नियमित होती हैं। वृक्क, यकृत तथा अन्य अंतरंग भी सुचारू रूप से कार्य करने लगते हैं। हठयोग समस्त प्रकार के रोगों को दूर करता है। स्वात्माराम जी ने अपनी कृति 'हठप्रदीपिका' में आसन, प्राणायाम, मुद्रा, नादानुसंधान तथा यौगिक चिकित्सा-विधि जैसे विषयों का निरूपण मुख्य रूप से किया है। हठयोग के अंतर्गत वर्णित आसनों को उच्चस्तरीय स्वास्थ्य बल एवं स्फूर्ति को बनाए रख ने का सर्वोत्तम साधन बताया है।

नाड़ियों के सभी प्रकार के मलों को केवल प्राणायाम के अभ्यास से ही दूर किया जा सकता है, प्राणायाम के अभ्यास से शरीर हल्का हो जाता है। षट्कर्मों के अभ्यासों से शारीरिक शुद्धि होती है। मुद्राओं से स्थिरता आती है, प्रत्याहार धैर्य प्रदान करता है। ध्यान से आत्मसाक्षात्कार होता है। समाधि निर्लिप्तता अर्थात कैवल्य प्रदान करती है।

इस तरह हठयोग साधक जीवन का एक अभिन्न अंग है। हठयोग के अभ्यासों के द्वारा हम मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर सकते हैं। अर्थात हठयोग के द्वारा ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है।

 हठयोग ( Hatha Yoga )

(योग विद्या के विविध आयामों में हठयोग का अपरिहार्य स्थान है। कहा जाता है कि हठयोग और तंत्र विद्या का संबंध अधिक निकट है अर्थात तंत्र विद्या से हठयोग की उत्पत्ति हुई। ऐसा कथन इसलिए कहा गया होगा कि भगवान शिव इन दोनों (तंत्र और हठ विद्या) के आदि प्रणेता थे और उन्हीं से इन विद्याओं का आविर्भाव हुआ। एक और मान्यता प्रचलित है कि चौदहवीं- पंद्रहवीं शताब्दी में तंत्र विद्या का विस्तार भारतवर्ष में चरमोत्कर्ष पर था। अधिक विस्तारित एवं प्रचलित होने के कारण इसका दुरुपयोग होने लगा। फलतः समाज में त्राहि-त्राहि मच गई। तब उसी काल में मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ जी ने इस विद्या के विकृत रूप को परिष्कृत कर उसे सर्वसुलभ हठयोग विद्या के रूप में प्रतिस्थापित कर दिया। जो राजयोग के एक अभिन्न अंग के रूप में प्रचलित होती आ रही है।

हठयोग की उत्पत्ति ( Origin of Hatha Yoga )

श्री आदिनाथाय नमोऽस्तु तस्मै येनोपदिष्टा हठयोगविद्या ।
विभ्राजते प्रोन्नतराजयोगमारोदुमिच्छोरधिरोहिणीव ।।

- हठप्रदीपिका 1/1

उन सर्वशक्तिमान आदिनाथ को नमस्कार है जिन्होंने हठयोग विद्या की शिक्षा दी, जो राजयोग के उच्चतम शिखर पर पहुँचने की इच्छा रखने वाले अभ्यासियों के लिए सीढ़ी के समान है।

ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव ने, जिन्हें यहाँ आदिनाथ कहा गया है, सर्वप्रथम अपनी पत्नी पार्वती को हठयोग की शिक्षा दी। हठयोग एवं तंत्र संबंधी ग्रंथ शिव-पार्वती संवाद के रूप में हैं।

चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में तंत्र विद्या पूरे भारतवर्ष में परमोत्कर्ष पर थी, परंतु कुछ पाखंडी विजातीय तत्वों ने हठयोग एवं राजयोग के विषय में भ्रांति फैलाने की कोशिश की। इनका मत था कि हठयोग और राजयोग दो अलग-अलग मार्ग हैं और इन दोनों के बीच में ऐसी चौड़ी खाई है जिसे पाटा नहीं जा सकता। इसके अतिरिक्त इन तत्वों ने वेश-भूषा, बाह्य आडंबर आदि पर अधिकाधिक जोर देकर योग एवं उसके साधना के संबंध में विभिन्न भ्रामक धारणा फैलाने की कोशिश की और इसमें कुछ समय तक के लिए ही सही, वे अंततः सफल भी रहे। किंतु भारतवर्ष इस अर्थ में सौभाग्यशाली रहा है कि जब-जब भी विकृतियाँ पैदा हुईं और अपनी चरम सीमा पर पहुँचती दिखाई दीं, तब-तब कोई न कोई महापुरुष उत्पन्न होते रहे, हमें निर्देश देते रहे और हमारा सही मार्गदर्शन करते रहे हैं। ऐसे ही महापुरुष श्री मत्स्येंद्रनाथ जी भी हुए जिन्होंने तंत्र विद्या के माध्यम से ही सर्वप्रथम हठयोग की विद्या जन-जन तक पहुँचाई। इनके पश्चात गोरक्षनाथ, स्वात्माराम जी ने इन्हें आगे विस्तारित करने में संपूर्ण सहयोग प्रदान किया। स्वात्माराम जी के अनुसार श्री आदिनाथ (भगवान शिव) हो हठयोग परंपरा के आदि आचार्य है।

हठयोग का अर्थ एवं परिभाषा ( Meaning and definition of Hatha Yoga )

'ह' और 'ठ' दो भिन्न वर्ष के मिलन से हठ शब्दकी व्युत्पत्ति हुई है। 'ह' का अर्थ सूर्य और 'ठ' चंद्र के अर्थ में प्रयुक्त होता है। ये सूर्य और चंद्र मनुष्य शरीर में विद्यमान नाड़ियों के नाम बताने के अर्थ में प्रयुक्त है, जिसे पिंगला या इड़ा भी कहा जाता है। अन्यान्य दो विपरीतधर्मी तत्त्व के संकेत के रूप में भी 'ह' और 'ठ' का प्रयोग मिलता है जैसे-प्राण और अपान, पित्त और कफ, ग्रीष्म और शीत, दिन और रात, शिव और शक्ति आदि।

हकारः कथितः सूर्य ठकारचन्द्र उच्यते।
सूर्य चन्द्रमसोर्योगात् हठयोग निगद्यते ।।

- सिद्ध सिद्धांत पद्धति

हकार सूर्य स्वर और ठकार से चंद्र चलते हैं। इन सूर्य और चंद्र स्वर को प्राणायाम आदि का विशेष अभ्यास कर प्राण की गति को सुषुम्नावाहिनी कर लेना ही हठयोग है।

मनुष्य शरीर में अवस्थित नाड़ियों से प्राणतत्त्व का संवाहन होता है, उनमें मुख्यतः सूर्य और चंद्र दो नाड़ी प्रधान है। इन दोनों के बीच में और एक शक्तिसंपन्न नाड़ी है, सुषुम्ना। दो भिन्न नाड़ियों में प्रवाहित होने वाले प्राण को एक धारा में समाहित कर उसे सुषुम्नागामी बनाने की प्रक्रिया को हठयोग कहते हैं। प्राणायाम आदि क्रिया के माध्यम से यह प्रक्रिया संपन्न होती है। इस प्रकार विखंडित प्राण प्रवाह को संवाही किया जाता है तब उस में अधिक शक्तिऔर गति पैदा होती है। फलस्वरूप प्राण का गुण उर्ध्वगामी होता है। शरीर में स्थित विभिन्न चक्र होते हुए प्राण का एक निर्दिष्ट मार्ग होता है। उर्ध्व मार्ग में आने वाले चक्र क्रमशः मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा को भेदन करते हुए सहस्रार की ओर गमन करता है। अंत में जब सहस्त्रार तक पहुँचता है तो यह अवस्था एक सिद्ध अवस्था कहलाती है। सुषुम्ना वाही प्राण की यह चरर्मोत्कर्ष अवस्था है। यही योग का चरम उत्कर्ष है। इसी अवस्था को समाधि, आत्मदर्शन, ब्रह्मसाक्षात्कार आदि नाम भी दिया जाता है। यह एक हठयोगी के लिए अभीष्ट लक्ष्य होता है। शिव और शक्तिका मिलन इसी बिंदु पर होता है। शिव जो समष्टि अर्थात परमात्मा तत्त्व के रूप में है और शक्तिजो व्यष्टि अर्थात जीवात्मा के अस्तित्व के रूप में है। इस प्रकार आत्मा का परमात्मा में और शिव का शक्तिमें एकाकार या समरूप होना ही योग है। इसी को प्राप्त करने का सर्वसिद्ध माध्यम हठयोग है।

चित्तवृत्ति निरोध द्वारा आत्मा की प्राप्ति के लिए करने योग्य द्वितीय श्रेणी की क्रियाओं का नाम हठयोग है। योग का अर्थ इन दोनों का संयोजन या एकीकरण है। योग शब्दकई अथर्थों में लिया जाता है-जैसे गणित शस्त्र में दो या दो से अधिक अंकों के मेल को योग कहा जाता है, आयुर्वेद में दो या अधिक औषधियों का मेल योग है, आध्यात्मिक भाषा में आत्मा और परमात्मा का मिलन योग होता है।

इसी प्रकार यहाँ सूर्य एवं चंद्र के एकीकरण या संयोजन का एक माध्यम हठयोग है। मनुष्य के अंदर दो प्रमुख शक्तियाँ सदैव ही कार्यरत रहती हैं वे हैं- (1) मन और (2) प्राण। मानसिक प्रक्रिया के कारण मनुष्य को 'धन' (+) तथा प्रकृति को ऋण (-) माना गया है, जिसके प्रतीक सूर्य एवं चंद्र हैं। सूर्य का स्थान मनुष्य के शरीर में दायाँ तथा चंद्र का बायाँ है।

हठ शब्द' ह, क्ष' का विकृत रूप है। इन अक्षरों का अर्थ है-

ह - सूर्य शक्तिका प्रतीक है।

क्ष - चंद्र शक्तिका प्रतीक है।

दूसरे मतानुसार हठयोग का अर्थ होता है-हकार और ठकार का योग। हठयोग का संबंध शरीर से एवं श्वास नियंत्रण से है।

'ह' एवं 'ठ' को कई अन्य नामों से भी जाना जाता है-

ह सूर्य, पिंगला, ग्रीष्म, पित्त, शिव, दिन एवं रजस।

ठ - चंद्र, इड़ा, शीत, कफ, शक्ति, रात एवं तमस।

सूर्य और चंद्र शब्दों की व्याख्या विभिन्न प्रकार से की गई है। एक व्याख्या के अनुसार सूर्य से तात्पर्य प्राणवायु तथा चंद्र का अपान वायु है। अतः प्राणायाम के अभ्यास द्वारा उक्त दोनों प्रकार की वायु का निरोध हठयोग है।

इस प्रकार हठयोग वह क्रिया है जिसमें इड़ा और पिंगला नाड़ी के सहारे, प्राण को सुषुम्ना नाड़ी के मार्ग से षट्चक्रों का क्रमशः भेदन करते हुए ब्रह्मरंध्र में ले जाकर समाधिस्थ कर दिया जाता है। योगशिखोपनिषद् में योग की परिभाषा करते हुए कहा गया है कि अपान व प्राण, रज व रेतस्, सूर्य व चंद्र तथा जीवात्मा व परमात्मा का मिलन योग है। यह परिभाषा भी हठयोग की सूर्य व चंद्र के मिलन की स्थिति को प्रकट करती है।

ह (सूर्य) का अर्थ सूर्य स्वर, दायाँ स्वर, पिंगला स्वर अथवा यमुना तथा ठ (चंद्र) का अर्थ चंद्र स्वर, बायाँ स्वर, इड़ा स्वर अथवा गंगा लिया जाता है। दोनों के संयोग से अग्निस्वर, मध्य स्वर, सुषुम्ना स्वर अथवा सरस्वती स्वर चलता है, जिसके कारण ब्रह्मनाड़ी में प्राण का संचरण होने लगता है। इसी ब्रह्मनाड़ी के निचले सिरे के पास कुंडलिनी शक्तिसुप्तावस्था में स्थित है। जब साधक प्राणायाम करता है तो प्राण के आघात से सुप्त कुंडलिनी जाग्रत होती है तथा ब्रह्मनाड़ी में गमन कर जाती है जिससे साधक में अनेकानेक विशिष्टताएँ आ जाती हैं। यह प्रक्रिया इस योग पद्धति में मुख्य है। इसलिए इसे हठयोग कहा गया है। यही पद्धति आज आसन, प्राणायाम, षट्कर्म, मुद्रा आदि के अभ्यास के कारण सर्वाधिक लोकप्रिय हो रही है। महर्षि पतंजलि ने मनोनिग्रह के साधन रूप में इस पद्धति का प्रयोग उपयोगी बताया है।

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