Learn how to do Pragya Yoga and know what are the benefits. ( जानें कैसे करें प्रज्ञा योग और जानें क्या हैं फायदे )

Learn how to do Pragya Yoga and know what are the benefits. 
( जानें कैसे करें प्रज्ञा योग और जानें क्या हैं फायदे )

प्रज्ञायोग-व्यायाम

इसे बाल-वृद्ध, नर-नारी सभी प्रसन्नतापूर्वक कर सकते हैं। इसमें सभी प्रमुख अंगों का व्यायाम संतुलित रूप से होता है। फलतः अंगों की जकड़न, दुर्बलता दूर होकर उनमें लोच और शक्ति का संचार होता है। योग व्यायाम की इस पद्धति में आसनों, उप आसनों, मुद्राओं, श्वास-प्रश्वास क्रम तथा शरीर संचालन की लोम-विलोम क्रियाओं का सुंदर समन्वय है। आसनों और प्राणायाम का यह संयुक्त प्रयोग शरीर और मस्तिष्क, स्थूल और सूक्ष्म दोनों के लिए बहुत ही लाभदायक है।

व्यायाम श्रृंखला की हर मुद्रा के साथ गायत्री मंत्र के अक्षरों- व्याहृतियों को जोड़ देने से, शरीर के व्यायाम के साथ मन की एकाग्रता और भावनात्मक पवित्रता का भी अभ्यास साथ-ही-साथ होता रहता है।

प्रज्ञायोग व्यायाम की मुद्राएँ चित्र सहित समझाई गई हैं। १६ निर्देशों में व्यायाम की एक श्रृंखला पूरी होती है। चित्रों के साथ  क्रम से व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप में व्यायाम किया जा सकता हैं।

 1. ॐ भूः (ताड़ासन)


विधि : धीरे-धीरे श्वास खींचना प्रारंभ करें। दोनों हाथों को ऊपर की ओर उठाएँ, दोनों पैर के पंजों के बल खड़े होते हुए शरीर को ऊपर की ओर खीचें। दृष्टि आकाश की ओर रखें। यह चारों क्रियाएँ एक साथ होनी चाहिए। यह समूचा व्यायाम ताड़ासन  की तरह संपन्न होगा। सहज रूप से जितनी देर मेंयह क्रिया संभव हो, कर लेने के बाद अगली क्रिया की जाए।

लाभ : हृदय की दुर्बलता, रक्तदोष और कोष्ठबद्धता दूर होती है। यह मेरुदंड के सही विकास में सहायता करता है। स्नायु तंत्र लचीला बनता है तथा शरीर जकड़न (आलस्य) शीघ्र दूर होती है।

2. भुवः (पाद हस्तासन)


विधि : श्वास छोड़ते हुए सामने की ओर (कमर से ऊपर का भाग, गरदन, हाथ साथ- साथ) झुकना। हाथों को 'हस्तपादासन'  की तरह नीचे की ओर ले जाते हुए दोनों हाथों से दोनों पैरों के समीप भूमि स्पर्श करें, सिर को पैर के घुटनों से यथासंभव स्पर्श कराने का प्रयास करें (घुटने से पैर मुड़ने न पाए)। इसे सामान्य रूप से जितना हो सके उतना ही करें। क्रमशः अभ्यास से सही स्थिति बनने लगती है।

लाभ : इससे वायु दोष दूर होते हैं। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना को बल मिलता है। पेट व आमाशय के दोषों को रोकता तथा नष्ट करता है। आमाशय प्रदेश की अतिरिक्त चर्बी भी कम करता है। कब्ज को हटाता है। रीढ़ को लचीला बनाता एवं रक्त संचार में तेजी लाता है।

3. ॐ स्वः (वज्रासन)


विधि : हस्तपादासन की स्थिति में सीधे जुड़े हुए पैरों को घुटनों से मोड़ें, दोनों पंजे पीछे की ओर ले जाकर उन पर वज्रासन  की तरह बैठ जाएँ। दोनों हाथ दोनों घुटनों पर, कमर से मेरुदंड तक शरीर सीधा, श्वास सामान्य। यह एक प्रकार से व्यायाम से पूर्व कीआरामदेह या विश्राम की अवस्था है।

लाभ : भोजन पचाने में सहायक, वायु दोष, कब्ज, पेट का भारीपन दूर करता है। यह आमाशय और गर्भाशय की मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करता है, अतः हार्निया से बचाव रहता है। गर्भाशय, आमाशय आदि में रक्त व स्नायविक प्रभाव को बदल देता है।

4. तत् (उष्ट्रासन)


विधि : घुटनों पर रखे दोनों हाथ पीछे की तरफ ले जाएँ। हाथ के पंजे पैरों की एड़ियों पर रखें। अब धीरे-धीरे श्वास खींचते हुए 'उष्ट्रासन'  की तरह सीने को फुलाते हुए आगे की ओर ऊर्ध्वमुखी खींचे। दृष्टि आकाश की ओर हो। इससे पेट, पेड़, गरदन, भुजाओं सबका व्यायाम एक साथ हो जाता है।



लाभ : हृदय बलवान, मेरुदंड तथा इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना को बल मिलता है। पाचन, मल निष्कासन और प्रजनन प्रणालियों के लिए लाभप्रद है। यह पीठ के दरद व अर्द्ध-वृत्ताकार (झुकी हुई) पीठ को ठीक करता है।

5. सवितुः (योग मुद्रा)


विधि : अब श्वास छोड़ते हुए पहले की तरह पंजों पर सीधे बैठने की स्थिति में आएँ, साथ ही दोनों हाथ पीछे पीठ की ओर ले जाएँ, व दोनों हाथ की अँगुलियाँ आपस में फँसाकर धीरे-धीरे हाथ ऊपर की ओर खीचें और मस्तक भूमि से स्पर्श कराने का प्रयास 'योगमुद्रा'  तरह करें।



लाभ : वायुदोष दूर करता है। पाचन संस्थान को तीव्र तथा जठराग्नि को तेज करता है। कोष्ठबद्धता को दूर करता है। यह आसन मणिपूरक चक्र को जाग्रत करता है।

6. वरेण्यं (अर्द्ध ताड़ासन)


विधि : अब धीरे-धीरे सिर ऊपर उठाएँ तथा श्वास खींचते हुए दोनों हाथ बगल से आगे लाते हुए सीधे ऊपर ले जाएँ। बैठक में कोई परिवर्तन नहीं। दृष्टि ऊपर करें और हाथों के पंजे देखने का प्रयत्न करें।  'अर्द्धताड़ासन' की स्थिति है।

लाभ : हृदय की दुर्बलता को दूर कर रक्तदोष हटाता है और कोष्ठबद्धता दूर करता है। जो लाभ ताड़ासन से होते हैं, वे ही लाभ इस आसन से भी होते हैं।


7. भर्गो (शशांकासन)


विधि : श्वास छोड़ते हुए कमर से ऊपर के भाग आगे (कमर, रीड़, हाथ एक साथ) झुकाकर मस्तक धरती से लगाएँ। दोनों हाथ जितना आगे ले जा सकें, ले जाकर धरती से सटा दें। 'शशांकासन'  तरह करना है।

लाभ : उदर के रोग दूर होते हैं। यह कूल्हों और गुदा स्थान के मध्य स्थित मांसपेशियों को सामान्य रखता है। साइटिका के स्नायुओं को शिथिल करता है और एड्रिनल ग्रंथि के कार्य को नियमित करता है। कब्ज को दूर करता है।

 8. देवस्य (भुजंगासन) 


विधि : हाथ और पैर के पंजे उसी स्थान पर रखते हुए, श्वास खींचते हुए, कमर उठाते हुए धड़ आगे की और ले जाएँ। घुटने जंघाएँ भूमि से छूनेदें। सीधे हाथों पर कमर से पीछे धड़ को ऊपर की ओर मोड़ते हुए सीना उठाएँ, गरदन को ऊपर की ओर तानें।  'भुजंगासन' जैसी मुद्रा बनाएँ।

लाभ : हृदय और मेरुदंड को बल देता है, वायु दोष को दूर करता है। यह भूख को उत्तेजित करता है तथा कोष्ठबद्धता और कब्ज का नाश करता है। यह जिगर और गुर्दे के लिए लाभदायक है।

9. धीमहि (तिर्यक् भुजंगासन बाएँ)


विधि :  भुजंगासन में कोई परिवर्तन नहीं, केवल गरदन पूरी तरह बाएँ ओर मोड़ते हुए दाएँ पैर की एड़ी देखें।

लाभ : भुजंगासन जैसे लाभ अभ्यासकर्ता को प्राप्त होते हैं।

10. धियो (तिर्यक् भुजंगासन दाएँ)


विधि : शरीर की स्थिति पहले जैसे रखते हुए गरदन दाहिनी ओर मोड़ते हुए बाएँ पैर की एड़ी देखें।

लाभ : भुजंगासन जैसे लाभ अभ्यासकर्ता को मिलते हैं।

11.  यो नः (शशांकासन)


विधि : हाथ-पैर के पंजे अपने स्थान पर ही रखे रहें। श्वास छोड़ते हुए घुटना से पैर मोड़ते हुए  शशांकासन की स्थिति में आएँ।

लाभ : शशांकासन के अनुसार लाभ प्राप्त होते हैं।

 12. प्रचोदयात् (अर्द्ध ताड़ासन)


विधि : यह मुद्रा, मुद्रा क्रमांक 6 की तरह 'अर्द्ध ताड़ासन' की होगी। गहरी श्वास लेते हुए कमर, गरदन, दोनों हाथ उठाएँ। 
लाभ : ताड़ासन जैसे लाभ।

13. भूः (उत्कटासन)


विधि : इस मुद्रा में पैर के पंजों के बल उत्कट आसन (चित्र नं० 11) की तरह बैठते है। सीना निकला हुआ, हाथ पंजे के समीप भूमि छूते हुए, हाथ सीधे या नमस्कार की मुद्रा में रखें। श्वास की गति सामान्य स्खें।

लाभ : पिंडली मजबूत बनती हैं। शरीर संतुलित होता है।



१४ भुवः (पाद हस्तासन)


विधि : तलवा धरती से पूरी तरह लगाएँ। घुटने से पैर सीधा करें। कूल्हे उठाएँ। हाथ के पंजों को पैर के पंजों के समीप रखें। श्वास बाहर निकालें। 

लाभ : इससे वायु दोष दूर होते हैं। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना को बल मिलता है। पेट व आमाशय के दोषों को रोकता तथा नष्ट करता है। आमाशय प्रदेश की अतिरिक्त चर्बी भी कम करता है। कब्ज को हटाता है। रीढ़ को लचीला बनाता एवं रक्त संचार में तेजी लाता है।


१५ स्वः (ताड़ासन)


विधिः धीरे-धीरे श्वास खींचते हुए कमर के ऊपर का हिस्सा गरदन, हाथ एक साथ उठाएँ। चित्र नं० १३ की भाँति शरीर को ऊपर की ओर खीचें। दृष्टि आकाश की ओर रखें। यह चारों क्रियाएँ एक साथ होनी चाहिए। यह समूचा व्यायाम चित्र नं० १३ पूर्व ताड़ासन की तरह संपन्न होगा। सहज रूप से जितनी देर में यह क्रिया संभव हो, कर लेने के बाद अगली क्रिया के लिए अगला नं० बोला जाए।

लाभ : इससे वायु दोष दूर होते हैं। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना को बल मिलता है। पेट व आमाशय के दोषों को रोकता तथा नष्ट करता है। आमाशय प्रदेश की अतिरिक्त चर्बी भी कम करता है। कब्ज को हटाता है। रीढ़ को लचीला बनाता एवं रक्त संचार में तेजी लाता है। हृदय दुर्बलता को दूर कर रक्तदोष ठीक करता है। आलस्य (शरीर का जकड़ना) मिटाता है।

१६ ॐ : बल की भावना करते हुए सावधान की स्थिति में आना।

विधि : ॐ का गुंजन करते हुए हाथों की मुट्ठियाँ कसते हुए बल की भावना के साथ कुहनियाँ मोड़ते हुए, मुट्ठियाँ कंधे के पास से निकालते हुए हाथ के नीचे सावधान की स्थिति में लाना। यह क्रिया श्वास छोड़ते हुए संपन्न करें।

इन सोलहों मुद्राओं के योग से योग व्यायाम का एक चक्र पूरा होता है। पहले क्रमशः एक-एक मुद्रा का अभ्यास कराया जाए। फिर क्रमशः पूरा योग व्यायाम किया-कराया जाए। प्रारंभ में एक- दो बार ही किया जाए। पीछे क्रमशः संख्या बढ़ाई जाती रहेगी। अंत में शवासन (शिथिलीकरण) करें। सामूहिक अभ्यास में एक साथ गति से ड्रिल के अनुशासन का पूरी तरह पालन कराते हुए व्यायाम कराया जाए। जो उस अनुशासन में फिट न बैठते हों, वे व्यक्तिगत अभ्यास करें। सामूहिक समस्वरता नष्ट न करें।


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