पिछली इकाई में आहार एवं आहार की परिभाषा की चर्चा की गई। प्रस्तुत इकाई में स्वस्थ जीवन हेतु आहार की आवश्यकता, गुणवत्ता, मात्रा, काल आदि पहलुओं की चर्चा की जाएगी। प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति के अनुसार आहार की आवश्यकता, मात्रा एवं काल किस प्रकार हो ताकि वह दीर्घायुष्य एवं स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सके।
आहार की आवश्यकता
शरीर की सुरक्षा, उसे गतिशील रखने और उसे पोषण प्रदान करने के लिए आहार की आवश्यकता होती है। आहार शरीर के समुचित, विकास, स्वास्थ्य एवं सुख का हेतु है। अतः आहार की समुचित संतुलित मात्रा ही लाभदायक है।
आहार से शरीर का पोषण होता है तथा बल, वर्ण, आयु, ओजस और तेजस की प्राप्ति होती है।
आचार्य श्री राम शर्मा कहते है-
"आहार का मुख्य उद्देश्य शरीर की क्षीणता अथवा घिसाई की पूर्ति करना और उसकीवृद्धि करना भी है। आहार से हमारे शरीर में ताप की उत्पत्ति भी होती है जो हमारे जीवन लक्षण है।"
'शरीर माद्यं खलु धर्म साधनम्'
धर्म का प्रथम साधन है. शरीर का निरोग रहना। चरक संहिता में कहा गया है कि धर्म अर्थ, काम तथा मोक्ष- इस पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति का मूल कारण शरीर का आरोग्य रहना है। शास्त्रकारों ने स्वास्थ्य की रक्षा के प्रयोजन को निर्दिष्ट करते हुए कहा है-
"सर्वमन्यत् परित्यज्य शरीरमनुपालयेत् ।
तदभावे हि भावनां सर्वाभावः शरीरिणाम् ॥"
अर्थात अन्यान्य कामो को छोड़कर सर्वप्रथम शरीर की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि शरीर का अभाव होने पर सब कुछ का अभाव हो जाता है।
इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि आहार का प्रमुख कार्य जीवन शक्ति प्रदान करना, शरीर का विकास, पोषण तथा उसकी रक्षा करना है। शरीर को बल, ऊर्जा आदि भोजर द्वारा प्राप्त होता है। भोजन मन का निर्माण भी करता है तभी तो कहा गया है
" जैसा खान अन्न वैसा बने मन'।
युक्तिव्यपाश्रय चिकित्सा में औषध और आहार की ही योजना की जाती है। अन्न को प्राणियों का प्राण कहा गया है-
प्राणाः प्राणभृतामन्नमन्नम्"
आहार से बल, वर्ण तथा ओजस् की प्राप्ति होती है। इस प्रकार आहार स्वस्थ तथा रोगी दोनों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। बिना समुचित आहार के स्वस्थ व्यक्ति स्वस्थ नहीं यह रह सकता और बिना उचित पथ्य- व्यवस्था के रोगी में चिकित्सा कर्म सफल नहीं हो सकता।
आहार की मात्रा एवं काल
आहार जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी तत्व है। परन्तु आहार के काल अर्थात समयएवं मात्रा का ध्यान रखना चाहिए। आहार की मात्रा व काल मनुष्य की शक्ति तथा उसके कार्य संबंधी कई बातों पर निर्भर करता है। आचार्य श्रीराम शर्मा आहार की मात्रा व काल का महत्व बताते हुए कहते है-
" भोजन सदा नियत मात्रा में करना चाहिए। कभी कम, कभी ज्यादा भोजन करना हितकारी नहीं होता। उचित और नियत समय पर खाने से पाचन क्रिया में सुविधा रहती है। और स्वास्थ्य में किसी प्रकार का व्याघात नही पड़ता'
महर्षि चरक आहार की मात्रा के बारे में बताते है-
"यावद्ध्यस्याशनमशितमनुपहत्य प्रकृति यथाकालं।
जरां गच्छति तावदस्य मात्राप्रणामं वेदितत्यं भवति ।।"
च.सं. (5/4)
आहार की जो मात्रा भोजन करने वाले के स्वभाव में बाधा न पहुँचाते हुए यथासमय पच जाए वही उस व्यक्ति के लिए भोजन की प्रमाणित मात्रा है। आयुर्वेद में भोजन की मात्रा कितनी हो उसे बताते हुए कहा गया है- "नित्य मात्रा के अनुसार किया गया आहार जठराग्नि को प्रदीप्त करता है। मात्रा का निर्धारण गुरू एवं लघु द्रव्यों के आधार पर होता है।"
तदनुसार गुरू पदार्थ (तेल तथा घी में तले हुए पदार्थ, दूध, मलाई, रबड़ी, आदि) का सेवन भूख की मात्रा से आधा ही करना चाहिए, और लघु (सुपाच्य) पदार्थो का तृप्तिपर्यन्त करना चाहिए, किंतु तृप्ति से अधिक नहीं। जितनी मात्रा में भोजन सुखपूर्वक पच जाय, उतनी मात्रा में भोजन करना उचित है।
आधुनिक मत के अनुसार आहार की मात्रा एवं काल
आहार की मात्रा व काल मनुष्य के शरीर तथा उसके कार्य सम्बन्धी कई भावों पर निर्भर है। एक सामान्य व्यक्ति विश्राम काल में लगभग 2000 कैलोरी शक्ति का उपयोग करता है। अतः उसे औसत में प्रतिदिन 2600 कैलोरी वाले भोजन को ग्रहण करना चाहिए। जो अधिक शरीरिक कार्य करते है, उन्हें लगभग 4000 कैलोरी की आवश्यकता होती है, जबकि आराम वाले तथा कम से कमशारीरिक कार्य करने वाले व्यक्ति को लगभग 2200 कैलोरी की आवश्यकता होती है।
वर्तमान समय में भोजन की मात्रा का निर्धारण कैलोरी के आधार पर किया जाता है। किसी स्वस्थ व्यक्ति को किलो कैलोरी के हिसाब से कितना भोजन करना चाहिए इसका वर्णन निम्नांकित है.
वजन काम का प्रकार आहार में उपस्थित Kcal.
पुरुष 60 Kg. हलके काम करता हो 2425 Kcal./Day
60 Kg. भारी काम करता हो 2815 Kcal./Day
60 Kg बहुत भारी काम करता हो 3800 Kcal./Day
महिला 50 Kg. हलके काम 1778 Kcal./Day
50 Kg. भारी काम 2225 Kcal./Day
60 Kg. बहुत भारी काम करती हो 3800 Kcal./Day
यदि महिला गर्भवती हो और तीन माह से उपर चल रहा हो तो उपर्युक्त आँकड़ों के हिसाब से 300 Kcal./Dayजुड़ जाएगा। यदि महिला बच्चों को दूध पिला रही हो 700 Kcal./Day जुड़ जाएगा।
बच्चों के लिए
आयु (वर्ष) कैलोरी/दिन
1-3 1193-1287
4-6 1670-1752
7-9 1833-2075
10-12 1965-2194
16-18 2064-2642
आचार्य पं श्रीराम शर्मा आहार की मात्रा के बारे में कहते हैं" कितना खाया जाए ? इसका उत्तर है भूख से कम। आधा पेट आहार से भरना चाहिए, चौथाई पानी के लिए और चौथाई हवा के लिए खाली रखना चाहिए। यदि आहार स्फूर्ति देने के स्थान पर आलस्य, भारीपन लाने लगे तो समझना चाहिए कि भोजन आवश्यक मात्रा से अधिक किया है।"
आहार का समय
भोजन की मात्रा की तरह समय का भी ध्यान रखना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि जैविक लय के अनुसार सही समय पर भूख लगने पर भोजन करना चाहिए।
आचार्य सुश्रुत आहार के काल के बारे में कहते हैं "मलमूत्र त्याग के पश्चात, इंद्रियों के निर्मल होने पर, शरीर को हलका अनुभव होने पर, अत्यंत शुद्ध उद्गार आने पर, हृदय के उपर किसी प्रकार के भार की प्रतीति न होने पर, अपानवायु के ठीक प्रकार से निकल जाने पर, शारीरिक मानसिक कष्ट का अनुभव न होने पर तथा उदर के शिथिल होने पर मनुष्य को भोजन करना चाहिए।"
आचार्य श्रीराम शर्मा जी कहते हैं "जब पिछला भोजन अच्छी तरह से पच चुका हो, पेट खाली हो गया हो और कड़ाके की भूख लगने लगे तभी भोजन करना चाहिए। यदि ऐसा न हो तो एक ही समय भोजन करना चाहिए और दूसरे समय का भोजन तब तक के लिए स्थगित कर देना चाहिए।"
आचार्य श्री नियत समय पर भोजन करने के लिए कहते हैं। वे कहते हैं कि जब कड़ाके की भूख लगे तभी भोजन करना चाहिए। पर साथ ही यह भी आवश्यक है कि अपना भोजन नियत समय पर कर लिया जाए। इसके लिए ऐसा कार्यक्रम बनाना चाहिए कि हमको नियत समय पर ही भूख लगे और हम उसी समय भोजन करें।
दिन में कितनी बार भोजन करना चाहिए? इसके लिए आचार्य श्रीराम शर्मा जी कहते हैं "सबके लिए एक सा सामान्य नियम तो नहीं बनाया जा सकता पर प्रौढ़ अवस्था के स्वस्थ व्यक्ति दिनमें दो बार ही भोजन करें। एक सुबह नौ-दस बजे के आस-पास, दूसरा शाम पाँच-छः बजे के आस- पास, तो यह स्वास्थ्य के लिए उत्तम कहा जा सकता है। इसके लिए सुबह नाश्ता नहीं करना चाहिए लेकिन जो बारह-एक बजे भोजन करते हैं वे सुबह हलका नाश्ता 8 बजे के लगभग ले सकते हैं पर शाम को नाश्ता नहीं करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर पेय पदार्थ ले सकते हैं।" आशय यही है कि नियत समय पर दो या तीन बार भोजन लेना चाहिए और बीच में कुछ भी नहीं खाना चाहिए, यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
भोजन नियत समय पर तथा उचित मात्रा में करना चाहिए। व्यक्ति को अपनी शारीरिक- मानसिक स्थिति तथा कार्य के अनुसार भोजन का निर्धारण करना चाहिए। अधिक शारीरिक श्रम करने वालों को मानसिक कार्य करने वालों की अपेक्षा अधिक भोजन लेना चाहिए। मात्रा का कोई निश्चित रूप नहीं बताया जा सकता है लेकिन कहा जाता है कि भूख से थोड़ा कम ही खाना चाहिए।
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