पिछली इकाई 'आहार के प्रमुख घटक' में आपने आहार के विभिन्न स्रोत के बारे में जाना।
प्रस्तुत इकाई में संतुलित आहार का अर्थ, महत्ता, स्वस्थ जीवन हेतु इसकी उपयोगिता के बारे में चर्चा करेगें।
संतुलित आहार
संतुलित आहार का अर्थ उस आहार से है जो शरीर की आवश्यकतानुसार सभी पोषक तत्वों को प्रदान करता है। शरीर को आहार की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से होती है-
(1) ऊर्जा के लिए
(2) शरीर निर्माण के लिए
(3) शरीर की क्रियाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए तथा सुरक्षा के लिए।
अतः वह आहार जो शरीर की ऊर्जा की आवश्यकता, शरीर की निर्माणक तत्वों की आवश्यकता तथा नियामक व सुरक्षात्मक तत्वों की आवश्यकता को पूरी करता है, संतुलित आहार कहलाता है।
संतुलित आहार प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान नहीं होता है। एक व्यक्ति का संतुलित आहार, हो सकता है, दूसरे के लिए अपर्याप्त हो तथा तीसरे के लिए आवश्यकता से अधिक हो अर्थात संतुलित आहार वह आहार है जो शरीर की सभी तत्वों की आवश्यकता को पूर्ण करता है। प्रत्येक व्यक्ति की पोषक तत्वों की आवश्यकता भिन्न-भिन्न होती है अतः प्रत्येक का संतुलित आहार भी भिन्न-भिन्न होता है।
संतुलित आहार विभिन्न कारकों से प्रभावित होता है। यह कारक निम्नलिखित है-
1) उम्र
(2) लिंग
(3) स्वास्थ
(4) क्रियाशीलता
(5) जलवायु व मौसम
(6) विशेष शारीर
1. उम्र-
उम्र से संतुलित आहार प्रभावित होता है। बच्चों को उनके शरीर के भार की तुलना में प्रौद व्यक्तियों से अधिक तत्वों की आवश्यकता होती है। संतुलित आहार में ऊर्जा प्रदान करने वाले तत्व, निर्माणक तत्व व सुरक्षात्मक तत्वों की आवश्यक मात्रा सम्मिलित होती है। बच्चों को ऊर्जा प्रदान करने वाले तत्वों की अधिक आवश्यकता उनके नये ऊतकों में ऊर्जा संग्रह के लिए होती है। बाल्यावस्था तथा वृद्धावस्था में शरीर की संवेदनशीलता बढ़ जाने के कारण सुरक्षात्मक तत्वों की अधिक आवश्यकता होती है। वृद्धावस्था में शरीर के शिथिल हो जाने के कारण क्रियाशीलता कम हो जाती है, अतः ऊर्जा की कम आवश्यकता होती है।
2. लिंग-
स्त्रियों व पुरूषों के संतुलित आहार में अन्तर होता है। पुरूषों की पोषकता तथा आवश्यकता स्त्रियों की अपेक्षा अधिक होती है। इसका कारण पुरूषों का आकार, भार, क्रियाशीलता का अधिक होना है। क्रियाशीलता व आकार, भार अधिक होने कारण उन्हें ऊर्जा की अधिक आवश्यकता होती है।
3. स्वास्थ्य
व्यक्ति का स्वास्थ भी पोषक तत्वों की आवश्यकता को प्रभावित करता है। अस्वस्थता की स्थिति में क्रियाशीलता कम होने के कारण एक स्वस्थ व्यक्ति की अपेक्षा कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है, पर यदि दोनों व्यक्तियों की क्रियाशीलता समान हो तो अस्वस्थ व्यक्ति की बी.एम.आर. अधिक होने कारण अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती। अस्वस्थ व्यक्ति के शरीर में टूट-फूट अधिक होने के कारण निर्माणक व सुरक्षात्मक तत्वों की आवश्यकता भी अधिक होती है, परन्तु पाचन क्रिया कमजोर हो जाने के कारण भोजन के रूप में अन्तर होता है।
4. क्रियाशीलता -
अधिक शारीरिक क्रियाशील व्यक्ति को अधिक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। जो व्यक्ति जितना अधिक क्रियाशील होगा, उसको ऊर्जा की आवश्यकता भी उतनी अधिक होती है। क्रियाशीलता अधिक होने के कारण शरीर में टूट-फूट भी अधिक होती है, अतः अधिक क्रियाशील व्यक्ति को निर्माणक तत्वों की आवश्यकता भी अपेक्षाकृत अधिक होती है।
5. जलवायु और मौसम-
जलवायु तथा मौसम भी आहार की मात्रा को प्रभावित करते हैं। गर्म प्रदेश के देशवासियों की अपेक्षा ठण्डे प्रदेश के देशवासियों को अधिक आहार की आवश्यकता होती है। ठण्डे देश के निवासी ऊर्जा का उपयोग शरीर का ताप बढ़ाने के लिए भी करते है, इसके अतिरिक्त ठण्डे देश के निवासी अपेक्षाकृत अधिक क्रियाशील होते है। इसी प्रकार सर्दियों के मौसम में उष्मा के रूप में ऊर्जा लेने के कारण अधिक भोजन की आवश्यकता होती है।
6. विशेष शारीरिक अवस्था-
कुछ विशेष शारीरिक अवस्थाएँ भी आहार की मात्रा व पोषक तत्वों की आवश्यकता को प्रभावित करती है, जैसे- गर्भावस्था, दुग्धापान अवस्था, ऑपरेशन के बाद की अवस्था, जल जाने के बाद।
संतुलित आहार की परिभाषा
संतुलित आहार वह है जिसमें सभी भोज्यावयव आवश्यक मात्रा में उपस्थित हों ताकि इनसे उपयुक्त मात्रा में शक्ति (Calories) प्राप्त होने के साथ-साथ शरीर की वृद्धि तथा रख-रखाव संबंधीसभी पोषक तत्व प्राप्त हों और आहार आवश्यक रूप से अधिक मात्रा में नहीं हो। संतुलित आहार स्वस्थ तथा रोगी व्यक्ति के लिए तथा विभिन्न प्रकार के शरीर, लिंग तथा व्यवसाय वाले व्यक्तियों के लिए अलग-अलग होगा और उसकी युक्तिपूर्वक योजना करनी होगी। भोजन में रुचि उत्पन्न करने वाले तत्व भी होने चाहिए ताकि मनुष्य को भोजन में रुचि हो और उचित मात्रा में ठोस पदार्थ हों, ताकि आँतों की गतिशीलता बनी रहे।
संतुलित आहार वहीं है जिसमें आहार विज्ञान और शरीर विज्ञान के अनुसार वे सभी चीजें उचित मात्रा में मौजूद हों जो शरीर निर्वाह के लिए आवश्यक है। ऐसे ही भोजन से शरीर का भली भाँति पोषण होता है। उससे पर्याप्त शक्ति और ताप की उपलब्धि होती है तथा स्वास्थ्य एवं आयु की वृद्धि होती है। संतुलित आहार में कार्बोज, वसा, प्रोटीन, खनिज लवण, जल तथा सभी प्रकार के विटामिन उचित मात्रा में होते हैं। जिनसे शरीर की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है। यदि इन खाद्य तत्वों में से किसी एक ही खाद्य तत्व का सेवन किया जाएगा तो स्वाभाविक है कि उससे शरीर की अन्य अनेकों आवश्यकताएँ पूरी न हो सकेंगी फलतः शरीर धीरे-धीरे पूर्ण पोषण न मिल पाने के कारण क्षीण हो जाएगा।
रक्त में क्षारत्व और अम्लत्व की उपस्थिति की दृष्टि से संतुलित भोजन आवश्यक है। सामान्यतः रक्त में क्षार तत्व और अम्ल तत्व की उपस्थिति का अनुपान 4: 1 होना चाहिए अर्थात 80 प्रतिशत क्षार और 20 प्रतिशत अम्ल रक्त में हो तो ऐसा रक्त ही शुद्ध समझा जाता है। यदि इनका संतुलन बिगड़ गया और रक्त में अम्ल तत्व की मात्रा बढ़ गई और क्षार तत्व कम हो गया तो उस व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। इसकी वजह यह है कि रक्त में क्षार तत्व की कमी या अभाव हो जाने से उसमें स्थित श्वेत कणों की हमारे उत्तम स्वास्थ्य के लिए काम करने की शक्ति क्षीण हो जाती है तथा शरीर-यंत्र को सुचारु रूप से परिचालित करने वाली सारी व्यवस्था ही नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है। मधुमेह, नेत्ररोग, सभी प्रकार के ज्वर, वात व्याधियाँ, पेट के रोग तथा हर प्रकार की पाचन की खराबियाँ आदि सभी रोग केवल रक्त में क्षार की कमी हो जाने से उत्पन्न होते हैं। कुछ वरिष्ठ डॉक्टरों के मतानुसार मृत्यु की परिभाषा है" अम्ल के शरीर द्वारा सोखे जाने का अंतिम परिणाम और क्षार तत्व का शरीर में अभाव।"
शरीर में जाकर भोजन क्षार अथवा अम्ल जातीय पदार्थ में बदल जाता है। जितने भी ताजे खट्टे फल हैं वे लगते तो अम्लीय प्रकृति के हैं, पर सभी क्षारधर्मी होते हैं। आमाशय में पहुँचकर ये सभी क्षारधर्मी तत्व में बदल जाते हैं और इनका खट्टा अंश उसी में विलुप्त हो जाता है। इसलिए किसी खाद्य वस्तु के स्वाद में खटास आने पर उसे अम्लधर्मी खाद्य पदार्थ नहीं माना जा सकता। अम्लधर्मी वा क्षारधर्मी पदार्थ इस प्रकार हैं
1. क्षारधर्मी खाद्य पदार्थ सभी ताजे, पके और खट्टे फल (विशेषकर नींबू जाति के), धारोपण दूध, मट्ठा, हरे साग, हरी तरकारियाँ छिलकों सहित, हरी मटर, आलू, मूली पत्ते सहित, प्याज, शहद गुड़, मक्खन, किशमिश, मीठी दही, गन्ना, गाजर, सलाद, हरा चना आदि।
2. अम्लधर्मी खाद्य पदार्थ - मांस, मछली, अंडा, पनीर, गेहूं, चावल, मकई आदि अनाज, रोटी, दालें, सूखा मेवा, सफेद चीनी और मिसरी आदि मिठाइयाँ, चाय, कॉफी तथा सभी नशे की चीजें, मुरब्बे, अचार, चटनी, सिरका आदि तली हुई चीजें, उबला हुआ दूध, खीर, मसाले, चटपटे, डब्बे बंद भोजन, नमक व तेल आदि।
जी.सी.एम.आर. के अनुसार- " संतुलित आहार वह आहार है जिसमें कि पोषक तत्व उनकी मात्रा तथा अनुपान में हो जिससे ऊर्जा, अमीनों एसिड, विटामिन्स, खनिज लवण, वसा, कार्बोहाइड्रेट तथा अन्य तत्वों की आवश्यकता शरीर की जैविक क्रियाओं तथा स्वास्थ्य को संतुलित बनाये रखने के लिए सही अनुपान में मिल जाये तथा साथ ही पोषक तत्वों का बहुत थोड़ा सा भाग शरीर में एकत्रित हो सके जिससे कि भूखा रहने पर शरीर को कुछ समय तक चलाया जा सके।
सतुलित आहार की आवश्यकता
(1) संतुलित आहार में व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार पोषक तत्वों की मात्राएँ शामिल होनी चाहिए।
(2) उसमें सभी पोषक तत्वों को स्थान मिलना चाहिए।
(3) संतुलित आहार ऐसा होना चाहिए कि विशेष पोषक तत्व साथ-साथ हो ।
जैसे- प्रोटीन और वसा, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट आदि।
(4) उस आहार में सभी पोषक तत्व उचित अनुपान में होने चाहिए।
(5) आहार उचित मात्रा में ऊर्जा प्रदान करने वाला होना चाहिए।
(6) शरीर में एकत्रित होने वाले पोषक तत्वों की मात्रा आहार में अधिक होनी चाहिए।
(7) संतुलित आहार में सभी भोज्य समूहो से भोज्य पदार्थ शामिल होने चाहिए।
(8) आहार, आकर्षक, सुगन्धित, स्वादिष्ट एवं रूचिकर होना चाहिए।
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