गरुड़ासन भुज मुद्रा (Garudasana Arms with Utkata Konasana)

गरुड़ासन भुज मुद्रा (Garudasana Arms with Utkata Konasana) – 







योग में कई ऐसे आसन हैं जो शारीरिक शक्ति के साथ-साथ मानसिक एकाग्रता को भी विकसित करते हैं। प्रस्तुत आसन गरुड़ासन भुज मुद्रा (Garudasana Arms) और उत्कट कोणासन (Utkata Konasana / Goddess Pose) का मिश्रण है। इसमें पैरों की स्थिति देवी आसन जैसी होती है और हाथों की स्थिति गरुड़ासन की तरह बनाई जाती है। यह संयोजन शरीर में लचीलापन, संतुलन और शक्ति का अद्भुत मेल प्रस्तुत करता है।

विधि

1. योगा मैट पर सीधे खड़े हो जाएँ और दोनों पैरों को लगभग 3 से 4 फुट की दूरी पर फैलाएँ।
2. पंजों को बाहर की ओर खोलकर घुटनों को मोड़ें और जाँघों को ज़मीन के समानांतर लाने का प्रयास करें, यह स्थिति उत्कट कोणासन कहलाती है।
3. अब हाथों को आगे लाएँ और दाहिने हाथ को बाएँ हाथ के नीचे से ले जाकर कोहनियों को क्रॉस करें।
4. दोनों हथेलियों को जोड़ते हुए प्रार्थना मुद्रा जैसा आकार बनाएं। यह स्थिति गरुड़ासन भुज मुद्रा है।
5. पीठ सीधी रखें, कंधों को रिलैक्स करें और दृष्टि सामने रखें।
6. इस आसन में 30–60 सेकंड तक सामान्य श्वास लेते रहें।
7. धीरे-धीरे हाथ खोलें, पैरों को सीधा करें और प्रारंभिक स्थिति में लौट आएँ।
8. दूसरी ओर भी इसी प्रकार दोहराएँ।

लाभ

शारीरिक लाभ:
  • कंधे, भुजाएँ और ऊपरी पीठ की जकड़न दूर होती है।
  • जाँघों, पिंडलियों और पेल्विक क्षेत्र की मांसपेशियाँ मज़बूत होती हैं।
  • रीढ़ की हड्डी में लचीलापन आता है और पीठ के दर्द में राहत मिलती है।
  • यह आसन रक्तसंचार को संतुलित करता है और शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है।

मानसिक लाभ:
  • मन की चंचलता कम होती है और एकाग्रता बढ़ती है।
  • तनाव और चिंता को कम करने में सहायक।
  • आत्मविश्वास और आंतरिक स्थिरता का विकास।

सावधानियाँ

  • जिन लोगों को घुटनों में गंभीर दर्द या चोट है, वे इसे न करें।
  • कंधे या कोहनी में चोट की स्थिति में हाथों की मुद्रा से बचें।
  • उच्च रक्तचाप और चक्कर की समस्या वाले व्यक्ति विशेषज्ञ की देखरेख में ही करें।
  • शुरुआत में अधिक देर तक न रुकें, धीरे-धीरे समय बढ़ाएँ।

महत्व

यह आसन शक्ति (Power) और संतुलन (Balance) दोनों का सुंदर समन्वय है। पौराणिक कथाओं में गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन माने जाते हैं, जो गति, शक्ति और समर्पण के प्रतीक हैं। वहीं, उत्कट कोणासन देवी शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। इन दोनों मुद्राओं का संगम साधक को आत्मबल, एकाग्रता और शारीरिक सामर्थ्य प्रदान करता है।


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