Characteristics of a healthy man ( स्वस्थ पुरूष के लक्षण )


पिछले खंड में हमने स्वस्थ एवं स्वस्थवृत्त के बारे में आपको बताया। इस इकाई में हम स्वस्थ पुरूष के लक्षणों के विषय में चर्चा करेंगे।

आरोग्य स्वाभाविकता है, प्रकृति की देन है और इसकी रक्षा करना हमारा प्रमुख कर्तव्य है। आरोग्य की रक्षा के कुछ सामान्य से सूत्र है। जिनकों धारण कर, उसके अनुसार आचरण कर हम उत्तम आरोग्य या स्वास्थ की प्राप्ति कर सकते है तथा अनेक शारीरिक व्याधियों का निवारण कर सकते है। इस इकाई में हम स्वस्थ पुरूष के लक्षणों की व्याख्या करेंगे।

स्वस्थ पुरूष के लक्षण

स्वस्थ पुरूष के लक्षणों की व्याख्या करने से पूर्व जीव या पुरूष की बहुपक्षीय आयुर्वेदीय अवधारणा का उल्लेख आवश्यक है।

शरीरेन्द्रिय सत्वात्मसंयोगो धारी जीवितम्
(च0सं01)

अर्थात 'पुरूष, शरीर इन्द्रिय-सत्व (मन) आत्मा का संयोग है अर्थात जीवित पुरूष के ये चार पक्ष है। अतः जब हम पुरूष के स्वास्थ्य की व्याख्या करते है तो स्वास्थ्य के लक्षणों का उल्लेख भी पुरूष के उन चारों पक्षों के ही संदर्भ में होना समाचीन है। आचार्य सुश्रुत ने निम्नलिखित संदर्भ में पूर्ण स्वास्थ्य के लक्षणों का अत्यन्त वैज्ञानिक वर्णन उपस्थित किया है। जो सुस्पष्ट रूप से 'पुरुष' के उपर्युक्त चारों पक्षों 'शरीरेन्द्रियसत्वात्म' की ओर संकेत करता है।

समदोषः समाग्निश्च समधातुमलकीयः।
आकर्षकात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ्य इत्याभिधीयते ॥
(सुश्रु. सं. 15:41)

जिस पुरुष का दोष, धातु, मल और अग्निव्यापार सम हो यानी सामान्य (विकार घटक) हो और इंद्रियां, मन और आत्मा आकर्षक हो, वही स्वस्थ है।

स्वस्थस्य रक्षणं कार्य भिषजा यत्नतः सदा आयुर्वेदोदितं तस्मात्स्वस्थयवृतं प्रचक्ष्यते ॥

वैद्य को सर्वदा स्वस्थ पुरूष के स्वास्थ्य की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए। चूँकि स्वास्थ्य सर्वथा इच्छित है इसलिए जिस उपाय से मनुष्य सदा स्वस्थ रहे वैद्य को वही उपाय करना चाहिए

दिन चर्या निशाचर्यमृतु चर्या यथोदिताम्। 
आचार्पुरुषः स्वस्थ सदा तिष्ठिति नान्यथा ॥
(भा.प्र.यू. 5/13)

आयुर्वेदशास्त्रोक्त दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या का आचरण करता हुआ ही मनुष्य सर्वदा स्वस्थ रह सकता है, इसके विपरीत उपायों से नहीं,।

सत्त्वमात्मा शरीरं च त्र्यमेत्तत्रिदंडवत्।
लोकस्थति संयोगत्रं सर्व प्रतिष्ठाम् ॥

(अध्याय 1/146)

मन, आत्मा और शरीर ये तीनों त्रिदंड के समान है। इन्हीं के संयोग से प्राणी जगत में विद्यमान रह सकता है और उसी पर सब कुछ आश्रित है।

कश्यपसंहिता में स्वास्थ्य को परिभाषित करते हुए बताया गया है कि अन्नाभिलाष, परिपाक,विण्मूत्रवात का यथोचित प्रवाह शरीर में लघुता और समाग्निता शारीरिक स्वास्थ्य के लक्षण है और बल वर्ण और आयुष्य तो स्वस्थ रहने का ही परिणाम है। इनमें अतिरिक्त 'सुप्रसन्नेन्द्रियत्वम्' तथा 'सुख स्वप्र प्रबोधकम्' मानस स्वास्थ्य का द्योतक है। इस प्रकार आयुर्वेद में 'पूर्ण स्वास्थ्य' (टोटल हेल्थ) को बल दिया गया है।



आयुर्वेद में पुरूष की मनोदैहिक प्रकृति का वर्णन करते हुए पुरूष के शारीरिक गठन, शरीर क्रियात्मक विशेषताओं तथा मानसिक स्तर के आधार पर प्रकृति का वर्गीकरण किया गया वहीं दूसरी ओर मानस प्रकृतियों का सविस्तार वर्णन किया गया है। आयुर्वेद में मानस स्वास्थ्य (Mental health) के लिए सत्व सार की परीक्षा का उल्लेख मिलता है। जो कि उत्तम मनोबल, मध्यम मनोबल एवं अल्प मनोबल के द्योतक है। सात्विक प्रकृति वाला व्यक्ति उत्तम मनोबल वाला, राजस प्रकृति वाला व्यक्ति मध्यम मनोबल वाला तथा तामस प्रकृति वाला व्यक्ति अल्प मनोबल वाला होता है। इनके अतिरिक्त लक्षण भी कहे गये है। स्वस्थवृत्तादि उपायों द्वारा पूर्ण स्वास्थ्यरक्षण के अतिरिक्त सवृत्त, आचार, योग एवं मेध्य रासायनों के प्रयोग द्वारा मानसिक तथा सामाजिक स्वास्थ के उन्नयन का भी उपदेश दिया गया है।

पूर्व इकाई में भी बताया जा चुका है कि चरकोक्त 'हितायु अहितायु' तथा 'सुखायु- दुःखायु' का प्रसंग मनुष्य के क्रमशः सामाजिक तथा व्यक्तिगत जीवन के गुण दोष का द्योतक है। सुखायु-दुःखायु का तात्पर्य मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन के सुख-दुःख से है जबकि हितायु- अहितायु का संकेत मनुष्य के सामाजिक पक्ष की ओर है। जो पुरूष सामाजिक दृष्टि से स्वस्थ है वह हितायु है, इसके विपरीत वाला अहितायु ।

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