इकाई में आपकों स्वास्थ्य के साथ-साथ मानव शरीर की अवधारणा से अवगत कराया जाएगा। 'स्वस्थवृत्त' चिकित्सा विज्ञान का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग है। हमारा शरीर, वात, पित्त, कफ से मिलकर बना है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में होने वाले वात, पित्त, कफ तीनों का सुनियोजित संतुलन बनाकर तथा विकृतियों पर लगाकर दिनचर्या, ऋतुचर्या व रात्रिचर्या का आचरण करते हुए, आत्मा, इंद्रियों व मन को प्रसन्न रखकर उत्तम स्वास्थ्य की कल्पना कर सकते है तथा उत्तम बल व आयु में वृद्धि कर सकते है। किस प्रकार हम स्वस्थ व सुखी रह सकते है और स्वस्थवृत्त के विषय में विस्तार से जानेंगें।
स्वस्थ का अर्थ
स्वास्थ्य शब्द का शाब्दिक विश्लेषण करके भी उसकी व्युत्पत्ति की दृष्टि से अर्थ करने का प्रयास देखने में आता है। स्वस्थ स्वस्थ, अर्थात जो स्वयं में स्थित हो। तात्पर्य यह है कि वह अवस्था जिसमें व्यक्ति अपने में ही स्थित हो स्वास्थ्य कहलाता है।
आयुर्वेद के दो प्रमुख उद्देश्य है-
1- स्वस्थ के स्वास्थ्य का परिरक्षण तथा,
2- आतुर के विकार का प्रशमन।
मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए स्वस्थ वृत्त का पालन आवश्यक है।
प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के दो पक्ष होते है, एक वैयक्तिगत और दूसरा सामाजिक। जिस प्रकार व्यक्ति का सामाजिक जीवन महत्वपूर्ण होता है, उसी प्रकार उसका व्यक्तिगत जीवन भी महत्वपूर्ण होता है। व्यक्ति को आरोग्यपूर्ण या स्वस्थ बने रहने के लिए दोनों पक्षों पर ध्यानदिया जाना आवश्यक है। इस प्रकार से पर्ण रूप से स्वस्थ व्यक्ति उसे कहा जाय जिसका शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक पक्ष दृढ़ होगा।
समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यमिधीयेर्त ॥
सू०सू० 15/48
सुश्रुत संहिता में स्वास्थ को परिभाषित करते हुए उपर्युक्त सूत्र कहा गया है अद जिसके वात, पित्त, कफ समान रूप से कार्य कर रहे हो. पाचन शक्ति ठीक हो, रस रक्तद धातुओं की क्रिया समान हो और आत्मा, इन्द्रिय तथा मन प्रसन्न हो, उसी को स्वास्थ कहते है धातुओरी भाषा में प्रथम पद में कहे गए दोष अग्नि, धातु, मल का संकेत शारीरिक स्वास्थ्य की ओर ईस जबकि द्वितीय पद में उल्लेखित मन, आत्मा, इंद्रिय संबंधी भाव का संबंध मानसिक आध्यात्मिक स्वास्थ्य से है। इस प्रकार दोनों पदों को मिला कर आचार्य सुश्रुत ने पूर्ण स्वास्थ्य परिभाषा दी है, क्योंकि पूर्ण स्वास्थ्य ही मूल लक्ष्य है। आधुनिक समय में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अनेको बार सुधार कर स्वास्थ्य को इस तरह परिभाषित किया है- Heath is a state of complete physical and mental, spiritual and social well being and not merely the absence of diseases or infirmity. अर्थात शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, सामाजिक रूप से स्वस्थ होने पर ही वह स्वस्थ कहलाएगें न कि रोग की अनुपस्थिति से। है।
आधिव्याधि रहित होना स्वास्थ्य का नकारात्मक पक्ष कहा जा सकता है जबकि शारीरिक कार्यों का ठीक प्रकार से होते रहना तथा प्रसन्नता की अनुभूति एक सकारात्मक पक्ष है। कश्यप संहिता में भी इसी प्रकार से 'स्वास्थ' के विविध शारीरिक तथा मानसिक लक्षण बताये गये है। अन्तर इतना ही है वहाँ पर 'स्वास्थ्य' शब्द का प्रयोग न होकर 'आरोग्य' शब्द प्रयुक्त है।
सामाजिक स्वास्थ्य की आयुर्वेद में व्याख्या आयु के मूलभूत लक्षणों के संदर्भ में की गई है। चरकोक्त 'हितायु-अहितायु' तथा 'सुखायु-दुःखायु' का प्रसंग मनुष्य के क्रमशः सामाजिक तथा व्यक्तिगत जीवन के गुण-दोष का घोतक है।
'सुखायु-दुःखायु' का तात्पर्य मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन के सुख-दुख से है जबकि 'हितायु-अहितायु' का संकेत मनुष्य के सामाजिक पक्ष की ओर है। जो पुरूष सामाजिक दृष्टि से स्वस्थ है वह हितायु है, इसके विपरीत वाला अहितायु है।
उद्देश्य बताये है। मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए स्वस्थवृत्त का पालन आवश्यक है। स्वस्थ वृत्त के अपालन में विविध शारीरिक तथा मानसिक विकार उत्पन्न होते रहते है और अस्वस्थ पुरूष इहलोक तथा परलोक में उपलब्ध पुरूषोचित भोगों को प्राप्त नहीं कर पाता।
आज तक सृष्टि की उत्पत्ति की भी प्रसिद्ध चिकित्सा पद्धतियाँ प्रचलित हैं, उनमें सबसे अधिक निदान परिवर्तन एवं 'स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं' को अल्प एवं 'आतुरस्य रोग प्रशमनं' को ही अत्यंत महत्व दिया जा रहा है। फैक्ट्री जिसे हम आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के नाम से जानते हैं।
मानव शरीर धारी के लिए आरोग्य प्रथम आकांक्षा है। इसलिए आरोग्य की पुरूषार्थ चतुष्टय (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) का मूल तथा तीन प्रमुख ऐषणाओं (प्राणैषणा, धनैषणा, लोकैषणा) की पूर्ति का माध्यम माना गया है। चरक संहिता में कहा भी है-
'धर्मार्थकामोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्'
(च.सं. 1)
अर्थात मनुष्य को स्वस्थवृत्त का मनोयोग पूर्वक अनुष्ठान करते हुए सदा स्वस्थ रहकर पुरूषार्थ - चतुष्टय प्राप्ति हेतु तत्पर रहना चाहिए।
स्वस्थवृत्त की परिभाषा
उत्थायोथाय सततं स्वस्थेनारोग्यमिच्छता।
धीमता यदनुष्ठेयं तदस्मिन् सम्प्रवक्ष्यते ॥
(स्व.वृ.सं. 1)
अर्थात स्वास्थ परिक्षण हेतु स्वस्थ पुरूष को नित्य सोकर उठने के बाद जो कर्म करना चाहिए उसे ही 'स्वस्थवृत्त' कहते है। स्वस्थवृत्त पालन से रोगों को दूर रखते हुए आरोग्य पूर्वक सप्रयोजन जीवनयापन किया जा सकता है और त्रयैषणा एवं पुरूषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति की जा सकती है। यही आयुर्वेद का प्रमुख उद्देश्य है। पृथ्वी पर कोई भी प्राणी अमर होकर नही उत्पन्न होता, अतः मृत्यु से त्राण नही मिल सकता परन्तु रोग दूर किये जा सकते है। इसी उद्देश्य से आयुर्वेद शास्त्र तथा स्वस्थवृत्त विज्ञान का विकास किया गया है। इस पर बल देने हेतु चरक संहिता में कहा गया है कि संसार में सब कुछ छोड़कर स्वशरीर का पालन करना चाहिए क्योंकि शरीर ही सर्व सुख-दुःख के भोग का माध्यम है। जिस प्रकार नगर स्वामी नगर तथा सारथी रथ की रक्षा में सदा तत्पर रहता है उसी प्रकार बुद्धिमान पुरूष को अपने शरीर की रक्षा में तत्पर रहना चाहिए।
आयुर्वेद में स्वास्थ्य परिक्षण हेतु विस्तृत दिनचर्या, रात्रिचर्या तथा ऋतु चर्या का उल्लेख 'है। इनके पालन से शरीर स्वस्थ रहता है और इनके अपालन से रोग उत्पन्न होते है।
इस प्रकार से हम आयुर्वेद के अनुसार वात, पित्त, कफ इन त्रिदोष को नियंत्रित रखने के लिए. स्वस्थ वृत्त का पालन कर सम्पूर्ण स्वास्थ प्राप्त कर सकते है।
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