Sleep and celibacy • Importance of sleep in health • Duration of sleep, types, merits and demerits • Celibacy and its importance • Essentiality of sleep and celibacy for a healthy life.निद्रा एवं ब्रह्मचर्य• स्वस्थवृत्त में निद्रा का महत्व• निद्रा की अवधि, प्रकार, गुण-दोष• ब्रह्मचर्य एवं इसका महत्व• स्वस्थ जीवन हेतु निद्रा एवं ब्रह्मचर्य की अनिवार्यता।


इससे पूर्व की इकाई 'स्वस्थवृत्त प्रयोजन, दिनचर्या, रात्रिचर्या' में हमने स्वस्थवृत्त का अर्थ, प्रयोजन, रात्रिचर्या एवं दिनचर्या पर प्रकाश डाला। प्रस्तुत इकाई में हम स्वस्थवृत्त के महत्वपूर्ण घटक निद्रा तथा ब्रह्मचर्य के बारे में चर्चा करेंगे। यहाँ निद्रा के प्रकार, महत्व, स्वस्थ जीवन हेतु इसकी आवश्यकता आदि पर विचार करेंगे। साथ ही साथ ब्रह्मचर्य का अर्थ, महत्ता एवं इसकी महिमा पर भी प्रकाश डाला जाएगा।

 निद्राः 

स्वास्थ की दृष्टि से निद्रा का महत्वपूर्ण स्थान है। निद्रा रात्रिचर्या का अंग होने से इसका उल्लेख स्वस्थवृत्त के रात्रिचर्या के संदर्भ में किया जा रहा है। निद्रा देह विश्राम के लिए ही है-

'देहं विश्रामते यस्मात्तत्समन्निद्रा प्रकीर्तिता'।

इसे वैष्णवी, पापमा अर्थात तमोजन्य और स्वभाविक माना गया है।

चरक संहिता में कहा गया है-

यदा तु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः वा क्लान्विताः। 
विषयेभ्यो निवर्तन्ते तदा स्वपति मानवः ॥

(च.सं. 21/35)

अर्थात् जब कार्य करते-करते मन थक जाता है एवं इन्द्रियाँ भी थकने के कारण अपने-अपने विषयों से निवृत्त हो जाती है, तब मनुष्य शयन करता है।मानस तथा शरीर प्रकृतियों के आधार पर भी भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को भिन्न प्रकार की निद्रा आती है। सुश्रुत संहिता में कहा गया है, कि हृदय देहधारी जीवों का चेतना स्थल है। अतः हृदय के तमोभिभूत होने से उन्हें निद्रा आती है। निद्रा का हेतु तम तथा बोधन का जागरण का हेतु सत्व गुण को माना गया है। इसके अतिरिक्त निद्रा व जागरण दोनों का प्रधान हेतु स्वभाव ही है-

स्वभाव एव तैंर्ग्रियाण परिकिर्त्यते।

(सुश्रु.सं. 4/34-35)

शरीर व मन के विश्राम के लिए निद्रा आवश्यक है। निद्रा भगवान की माया है, वह तमोजन्य कही गई है। इसी कारण स्वभावतः सभी प्राणियों को स्पर्श करती है।

महत्ता - 

शरीर के लिए जिस प्रकार आहार आवश्यक है, उसी प्रकार जीवन के लिए नींद भी अपेक्षित है। भोजन के बिना तो शायद मनुष्य कुछ समय तक जीवित भी रह सकता है परंतु निद्रा के बिना दो-चार दिन जीवन भी कठिन हो जाता है। शरीर को पुष्ट तथा सबल बनाना अर्थात स्वास्थ्य और आरोग्य, निद्रा पर ही निर्भर है। अतः रात्रि को निश्चित समय पर सोने का क्रम अपना लेना चाहिए। निद्रा से इंद्रियों की कार्य शक्ति पुनः ठीक हो जाती है। निद्रा से सुख तथा आयु की वृद्धि होती है। निद्रा की स्थिति में हदय और नाड़ी की गति कम हो जाती है। फेफड़ों को भी विश्राम मिल जाता है।

 निद्रा अवधि-

कितनी देर निद्रा लेनी चाहिए इस संबंध में निश्चित नियम निर्धारण करना कठिन है। भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में तथा भिन्न-भिन्न कार्यों के अनुसार नींद की आवश्यकता पड़ती है।
एक नवजात शिशु दिन और रात्रि में लगभग 22 घंटे सोता है। 2 वर्ष का बालक 14 घंटे सोता है। ज्यों-ज्यों बच्चा बड़ा होता जाता है, उसकी निद्रा का समय कम हो जाता है। युवकों को 6-7 घंटे अवश्य सोना चाहिए। छोटे बच्चे 8 या 10 घंटे सोते हैं।
शारीरिक श्रम करने वाले को गहरी निद्रा आती है। कम समय नींद लेने से शरीर में थकान बनी रहती है। मानसिक कार्य करने वाले को कुछ समय सोने से भी स्फूर्ति आ जाती है। निद्रा पूर्ण तब मानी जाती है जब व्यक्ति सोकर उठे तो प्रसन्नचित्त, थकान से रहित, आनंदितमहसूस करे। रात्रि के प्रथम प्रहर में गहरी निद्रा आती है। अतः 10 बजे तक सो जाना चाहिए। सोने से पूर्व लघुशंका अवश्य करनी चाहिए। सोते समय अंधकार होना चाहिए।
आयुर्वेद संहिताओं में गीले पैर भोजन तथा सूखे पैर सोना कहा गया है, इससे आयु की वृद्धि होती है।

 निद्रा के प्रकार- 

चरक संहिता में छह प्रकार की निद्रा बताई गई है ये है तमोभव, श्लेष्मसमुद्धा, मन: शरीर श्रम-समुद्धा, आगंतुकि, व्याध्यनुवर्तिनी, रात्रिस्वभावप्रभा। रात्रि में स्वभावतः आने वाली, स्वाभाविक निद्रा भूतधात्रि अर्थात् प्राणधारक मणि बनी है, यही उपस्तम्भो में मुद्रा बनी है। तमोभव निद्रा पाप का मूल है। शेष निद्रायें व्याधिवर्गीय मणि गयी है।

चरकानुसार निद्रा के प्रकार -
(1) तमोभव निद्रा (तमोजन्य)
(2) श्लैष्मिकसमुद्रवा निद्रा (कफोजनजिया)
(3) मनः शरीर श्रमसमुद्धवा निद्रा (मानसिक शारीरिक श्रमोत्पन्न)
(4) आगंतुकी निद्रा (आगंतुक)
(5) व्याध्यानुवर्तिनी निद्रा (व्याधि की अनुगामिनी)
(6) रात्रिस्वभावप्रभवानिद्रा (रात्रि में स्वाभाविक निद्रा को धारण करने वाली)

उपर्युक्त सभी निद्रा में तमोजन्य निद्रा पाप का मूल है, शेष निद्राएँ व्याधियों में कही गयी है एवं छठी निद्रा सबसे अच्छी मानी गयी है। जब संज्ञावाही स्रोतों में तम प्रधान कफ युक्त होता है, तब मनुष्यों को न जगाने वाली तामसी निद्रा आती है। यह मृत्यु काल में होती है। तम प्रधान लोगों को दिन-रात नींद आती रहती है। रजोगुण प्रधान लोगों को अनियमित (बेवक्त नींद आती है) सत्वगुण प्रधान लोगों को आधी रात तक ही नींद आती है। निद्रा के कारण तम और जागरण का कारण सत्वगुण की अधिकता है। इसी प्रकार सतोगुणी व्यक्तियों को नींद कम आती है। अतः इन दोनों का कारण प्राकृतिक समझा जाना चाहिए।

युक्त निद्रा के गुणः-

युक्त निद्रा के गुणयथासमय सेवित निद्रा पुष्टि, बल, उत्साह, अग्निदीप्ति, चेतना और धातु साम्य प्रदान करती है।

भोजनान्तरं निद्रा वातं हरति पित्तहृत्। 
कफं करोति वपुषः पुष्टिसौख्यं तनोति हि

भा.प्र. 5/220

भोजनोपरांत नींद वायु, पित्त को हरती है, कफ करती है और शरीर में पुष्टि एवं सुख का विस्तार करती है।

अयुक्त निद्रा दोष-

1- असमय एवं अधिक सेवित तथा न सेवन की हुई नींद दूसरी कालरात्रि के समान सुख और आयु को हरती है।
2- असमय सोने से मोह, मनोविभ्रम, ज्वर, शरीर में ढीलापन के समान, जुकाम, सिर दर्द, शोथ, जी मिचलाना, श्रोतों की रुकावट और अग्निमांध होता है।
3- भोजन करके सो जाने से कुपित कफ, अग्नि (पाचन शक्ति) का नाश कर डालता है। इसलिए रात में न जागें और न दिन में सोवें। इन दोनों को दोष कारक जानकर बुद्धिमान मात्रापूर्वक ही निद्रा सेवन करें।
इस प्रकार निरोग, आकर्षक मन, बलवर्ण युक्त, वृषभ, वीर्यवान, न अति स्थूल न कृष और लक्ष्मीवान या वृद्ध मनुष्य सौ वर्ष जीता है।
आजकल निद्रा कारक औषधियों का सेवन अधिक किया जा रहा है। दिन व रात्रि दोनों में ही सोने का क्रम अपनाया जा रहा है। इससे शरीर में कई प्रकार के विकार उत्पन्न होकर व्यक्ति रोग ग्रसित हो जाता है। स्वाभाविक निद्रा में आहार-विहार का संयम, मानसिक विकारों से बचने का प्रयास करना चाहिए।

ब्रह्मचर्य-

आयुर्वेद में उत्तम स्वास्थ्य अर्थात ब्रह्मचर्य को स्वस्थवृत्त का अंग माना है। सामान्यतः ब्रह्मचर्य का अर्थ' वीर्यपात न करना' समझा जाता है। जो व्यक्ति स्त्री सपंर्क से बचते है उन्हें ब्रह्मचारी कहा जाता है। यह आधा अर्थ हुआ। ब्रह्म का अर्थ है परमात्मा में आचरण करना, जीवन लक्ष्य में तन्मय हो जाना, सत्य की शोध में सब ओर से चित्त हटाकर जुट पड़ना ब्रह्म का आचरण है। इसके साधनों में वीर्यपात न करना भी एक है। विषय मात्र का निरोध ही ब्रह्मचर्य है।

ब्रह्मचर्य पालन में आज के समय में कठिनाई हो गई है। चारों ओर का वातावरण अत्यधिक दूषित हो गया है। टीवी पर अश्लील चित्र एवं संगीत की ध्वनि से अधिकांश लोगों के मन खोखले हो गए हैं।

हमारे मन में सब प्रकार की वासनाओं के बीज हैं, लेकिन हमको स्वयं तय करना है, किसे अंकुरित किया जाए और किसे नहीं। बीजों को अंकुरित करने के लिए यदि खाद व पानी न दिया जाए तो वैसे ही पड़े रहेंगे और कुछ समय बाद सूखे जाएँगे।

आज मासिक पत्रिकाओं में शास्त्र, इतिहास, साहित्य, राजनीति, शिक्षा, व्यापार एवं खेल, आरोग्य, सवृत्त एवं आचार संबंधी, बच्चों को जननेंद्रिय की जानकारी एवं उनके कार्य तथा स्वच्छता का ज्ञान आवश्यक हो गया है। प्रारंभ से ही बच्चों को आहार-विहार एवं निरोग कैसे रहें ? इनका शिक्षण होता रहे तो ब्रह्मचर्य पालन में कोई कठिनाई नहीं होगी।

ब्रह्मचर्य किसी एक इंद्रिय का संयम नहीं है, अपितु ब्रह्मचर्य जीवन का संयम है। ब्रह्मचर्य तभी संभव है जब आँख, कान, जिह्वा आदि सभी इंद्रियों का संयम किया जाए। नेत्रों से अश्लील चित्र, कानों से अश्लील गीत, जिह्वा से तीक्ष्ण मिर्च मसालेदार उत्तेजक पदार्थों का सेवन न किया जाए।

ब्रह्मचर्य का तेज ऐसा है, जो शरीर में फैलता है। वह आँखों में दिखाई देता है। वाणी में उतर आता है और चेहरे पर खिल उठता है। स्वामी विवेकानंद को देखते ही लोगों की आँखें चौधिया जाती थीं। स्वामी रामतीर्थ को देखते ही प्रसन्नता अनुभव होती थी। ब्रह्मचर्य की महिमा अपार है। ब्रह्मचर्य प्रयत्न साध्य है। व्रत-बधं के द्वारा इसके पालन में सहायता मिलती है।

कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा।
सर्वत्र माहि यज्ञं ब्रह्मचर्य प्रचक्षते

शरीर, मन, वाणी इन तीनों से सर्व अवस्थाओं में सर्वदा तथा सर्वत्र मैथुन त्याग को ब्रह्मचर्य कहते हैं।
व्यवहार में लोग मैथुन का तात्पर्य केवल स्त्री-पुरुष का समागम समझते हैं, परंतु यह मैथुन का संकुचित अर्थ है। उसका व्यापक अर्थ है और उसके आधार पर ब्रह्मचर्य का स्पष्टीकरण इस प्रकार किया गया है

स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणम्।
संकल्पोऽयवसायश्च क्रियानिवृत्तिरेव च।।

1- पुरुषों के द्वारा स्त्रियों का तथा स्त्रियों द्वारा पुरुषों का स्मरण, 
2- गुणगान, 
3- उसके साथ क्रीड़ा करना, 
4- उनकी ओर कामुक दृष्टि से देखना, 
5- एकांत में बातचीत, 
6- मैथुन के लिए संकल्प करना, 
7- तदर्थ प्रयत्न और 
8- संभोग इन आठ अंगों को मैथुन कहा गया है। स्त्रियों का केवल स्मरण मात्र विकार उत्पन्न करता है।

स्त्रीरत्न यान मात्रां तु ब्राह्मणोंऽपिमनोहरत्।
किं पुनश्चत्रेषां तु विषयेच्छनुवर्तिनाम्।।

स्त्री रत्न का केवल ध्यान, ब्रह्म के मन को भी आकर्षित करता है, फिर विषय सेवन केपीछे पड़े हुए अन्यों की क्या दशा होगी। नारी को कुदृष्टि से देखना सर्प विष के समान है। अपना हित चाहने वाले को मन से भी उसका चिंतन नहीं करना चाहिए। सुंदर पुष्प, पका फल, स्त्रियों का यौवन, इनको बेधक दृष्टि से देखने पर मन विचलित हो जाता है।

माता, बहन अथवा युवा कन्या के साथ भी कभी एकांत में नहीं रहें, क्योंकि बलवान इंद्रियाँ विद्वान को भी अपनी ओर खींचकर पाप कर्म में प्रवृत्त कर देती हैं।

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