पिछली इकाईयों में आपने स्वास्थ, स्वस्थवृत्त, स्वस्थपुरूष के लक्षण के विषय में जाना आगे हम स्वस्थवृत्त के उद्देश्य एवं प्रयोजन के विषय में जानेगें।
जैसा कि हम जानते है कि स्वस्थवृत्त आयुर्वेद का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। मानव शरीर धारी के लिए आरोग्य सबसे प्रथम आकांक्षा है। आरोग्यता ही मनुष्य जीवन की सार्थकता बतलाती है। आरोग्य रहकर ही मनुष्य अपना लौकिक और पारलौकिक कर्त्तव्य पूरा करने में समर्थ होता है। पूर्ण आयुष्य और दीर्घायुष्य प्राप्ति उसे ही होती है जो निरोग और सशक्त है तथा सब प्रकार के कर्त्तव्य पालन करने में समर्थ है। शरीर और जीवात्मा के संयोग का नाम जीवन है और उस जीवन की उपस्थिति ही आयुष्य है। आरोग्य के बिना पुरूषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति नही हो सकती। इस इकाई में स्वस्थवृत्त के उद्देश्य एवं प्रयोजन की चर्चा की गई है।
स्वस्थवृत्त का प्रयोजन
पूर्व में भी बताया जा चुका है कि स्वस्थ रहना मनुष्य का अधिकार है, यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए स्वस्थवृत्त का पालन आवश्यक है। स्वस्थवृत्त के अपालन से नानाविध शारीरिक तथा मानसिक विकार उत्पन्न होते रहते है और अस्वस्थ पुरूष इहलोक तथा परलोक में उपलब्ध पुरूषोचित भोगों को प्राप्त नहीं कर पाता। इसलिए आरोग्य को पुरूषार्थ चतुष्टय (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) का मूल तथा तीन प्रमुख ऐषणाओं (प्राणैषणा, धनैषणा और लोकैषणा) की पूर्ति का माध्यम माना गया है इस प्रकार से यह कहा जा सकता हैं कि स्वस्थवृत्त का प्रमुख उद्देश्य एवं प्रयोजन 'सम्पूर्ण स्वास्थ' प्राप्त करना ही है। आरोग्य के लिये आयुर्वेद के उपदेशों को विधिपूर्वक निर्वाह करना मनुष्य मात्र का कर्तव्य है। आरोग्य के बिना पुरूषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति नही हो सकती। आचार्य बाग्भट्ट कहते हैं
"आयुः कामायमानेन धर्मार्थ सुख साधनम्।
आयुर्वेदोपदेशु विधेयः परमदारः।"
अर्थात मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिये, पूर्णायु तक जीवन यापन के लिये निम्न निर्दिष्ट तीन प्रमुख नियमों का पालन करना अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि ये शरीर अथवा जीवन के तीन उपस्तम्भ हैं-
1. आहार,
2. निद्रा
3. ब्रह्मचर्य।
जब कभी भी इनके समुचित परिपालन मे किसी प्रकार का व्यवधान उपस्थित होगा, तभी रोगमूलक परिणाम प्राप्त होगे। इस प्रकार जब तक हम सवृत्त का पालन नही करेंगे तब तक इसी प्रकार आधि-व्याधियों से ग्रसित होते रहेंगे।
आधुनिक स्वस्थवृत्त का अध्ययन परम्परा में मुख्यता
(1) व्यक्तिगत स्वस्थवृत्त
(2) सामाजिक स्वस्थवृत्त के माध्यम से किया जाता है। व्यक्तिगत स्वस्थ वृत्त प्रधानतः शरीर से सम्बन्धित है। स्वस्थवृत्त के अन्र्तगत सम्पूर्ण दिनचर्या अर्थात स्वस्थ पुरूष का नित्य सोकर उठने से रात्रिचर्या (सोने तक) तक होती है। इसके बारे में आगे विस्तार से वर्णन किया जा रहा है-
दिनचर्या
प्रत्येक मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठकर धर्म और अर्थ का चिंतन करना तथा शरीर के रोग, उनके कारणों का विचार करना तथा वेद के रहस्यों का भी चिंतन करना चाहिए।
प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में शय्या अवश्य छोड़ देनी चाहिए। चौबीस घंटों में ब्रह्ममुहूर्त ही सर्वश्रेष्ठ है। मानव जीवन बड़े भाग्य से प्राप्त होता है। उसका प्रत्येक क्षण बहुमूल्य है। संव तुलसीदास ने कहा है
बड़े भाग मानुष तन पावा। सुरदुर्लभ सब ग्रंथहि गावा।।
प्रत्येक प्रभात मानव जीवन का आरंभ काल है। इसी समय जीवन के उत्थान और निर्माण का स्फूर्तिदायक संदेश मिलता है। प्रातःकाल कमल खिल जाते हैं, पक्षी मधुर कलरव करने लगते हैं, मृदुल समीर मंगति से बहने लगती है। सृष्टि में एक नव जीवन, नव चेतन, स्फूर्ति दिखाई देने लगती है।शारीरिक स्वास्थ्य, मन, बुद्धि, आत्मा सभी की दृष्टि से ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए। इस समय प्रकृति मुक्त हस्त से स्वास्थ्य, प्रसन्नता, मेधा, बुद्धि की वर्षा करती है।
प्रारंभिक पालन नियम
1. आत्मबोध की साधना- जागते ही चेतना कां शरीर से सघन संपर्क बनता है, यह नये जन्म जैसी स्थिति होती है। जागते ही पालथी मारकर बैठ जाएँ। ठंडक हो तो वस्त्र ओढ़े रहें। दोनों हाथ गोदी में रखें, सर्वप्रथम लंबी श्वास लें, नील वर्ण प्रकाश का ध्यान करें, नाक से ही श्वास छोड़ें, दूसरी श्वास में पीले प्रकाश का ध्यान करते हुए पूर्ववत क्रिया दोहराएँ। तीसरी बार फिर रक्त वर्ण का ध्यान करते हुए गहरी श्वास लें, धरि-घरि नाक से ही श्वास छोड़ दें। स्वस्थ प्रसन्नचित्त हो अनुभव करें कि परमात्मा ने कृपा करके हमें आज नया जन्म दिया है कि उनका पुत्र इस जीवन का कैसा उपयोग करता है। हम उसके प्रिय पुत्र हैं नैष्ठिक साधक हैं, उसकी योजना के अनुसार ऐसा जी कर दिखाएँगे कि उसकी आँखें प्रसन्नता से चमक उठें।
आज के नये जन्म के लिए भगवान का आभार मानते हुए साधक के अनुरूप दिनभर के क्रिया-कलापों का खाका मस्तिष्क में बनाना चाहिए। प्रार्थना करनी चाहिए हे प्रभू! आपने हमें जो दुर्लभ शरीर-विभूतियाँ एवं अवसर सहित यह जीवन दिया है, उसे हम सार्थक बनाने का संकल्प लेते हैं। हे दाता ! आपने जिस उदारता से यह सब दिया है, हम उसे उसी स्तर की तत्परता के साथ उपयोग में लाएँगे। हम अपनी सामर्थ्य में कोई कसर नहीं रहने देंगे। आप हमें शक्ति देना।
2. पृथ्वी माँ को नमस्कार- निम्न श्लोक बोलते हुए पूर्ण भक्ति भावना के साथ पृथ्वी माँ को प्रणाम करें, तब शय्या त्याग करें।
समुद्रे वसने देवी पर्वतस्थान मंडले।
विष्णु पत्नीं नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमास्वमे
मेखला तागड़ी की तरह सब ओर से समुद्र से घिरी हुई, पर्वतरूपी स्तनों से सुशोभित, विष्णुपत्नी-पृथ्वी माता आपको नमस्कार है। मुझे पैरों से स्पर्श के लिए आप पर पैर रखकर अब मैं अपनी जीवन यात्रा आरंभ कर रहा हूँ आप क्षमा करें।
3. ऊषापान- ऊषापान शौच जाने से पूर्व ही करना चाहिए। आयुर्वेद में ऊषापान का विधान है। प्रातः उठकर नित्य ऊषापान जो करता है, निज शरीर को स्वस्थ बना रोगों से रक्षा करता है। ऊषापान में शीतल जल का ही सेवन करना सर्वोत्तम है। दुर्भाग्य से आज भारतवर्ष में अधिकांश व्यक्तियों को बेड टी, कॉफी आदि पीने की आदत पड़ गई है, जो हमारे स्वास्थ्य के नियमों के प्रतिकूल है। शीतल जल हमारे दाँतों के लिए लाभकारी है तथा पाचन संस्थान को बल प्रदान करता है। ऊषापान से मल कीअच्छी तरह शुद्धि होती है, उत्साह की वृद्धि होती है तथा वीर्य संबंधी रोग दूर हो जाते हैं। काम विकार, शारीरिक उष्णता, बवासीर, उदर रोग, सिर दर्द, नेत्र विकार दूर हो जाते हैं।
4. मल त्याग - ऊषापान के पश्चात शौच जाना चाहिए। सुश्रुत संहिता में लिखा है
आयुष्यमिष्यति प्रोक्तं मलादिनाम विसर्जनम्।
प्रातःकाल सूर्योदय के पूर्व मल त्याग करना दीर्घायु प्रदान करता है। शौच में बैठने की भारतीय विधि ही सर्वोत्तम है। दाहिने पैर पर जोर देकर बैठने से शौच खुलकर आता है। यदि मल त्याग के समय दाँतों को भींचकर बैठा जाए तो दंत रोग नहीं होते। मल विसर्जन का जो लोग ध्यान नहीं रखते उनके शरीर में विकार संग्रह होकर रोग उत्पन्न होने लगते हैं। प्रतिदिन प्रत्येक व्यक्ति को दो बार शौच अवश्य जाना चाहिए प्रातः आत्मबोध साधना के बाद तथा सायंकाल तीसरे पहर।
5. दंत धावन-
दाँतों की उपमा मोतियों से दी जाती है। मोतियों का सौंदर्य, उनकी चमक-दमक, आभा एवं लावण्य अपनी ओर आकर्षित करते हैं। मनुष्य शरीर के लिए दाँत बहुत उपयोगी हैं। दाँत हमारे शरीर के निर्माता और रक्षक हैं। दाँतों के स्वस्थ रहने पर शरीर स्वस्थ रहता है। दाँतों के बिना मुख की शोभा एवं सुंदरता विलीन होकर व्यक्ति सौंदर्य विहीन हो जाता है। हमारे प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों ने दातुन की बहुत प्रशंसा की है। नीम, बबूल, सिहोरा, खदिर, कनेर, महुआ, अर्जुन, बादाम, मौलश्री आदि की दातुन करने से दाँत दृढ़ हो जाते हैं।
दातुन करना भी एक कला है। दातुन सदैव बैठकर करना चाहिए। दातुन करते समय लोगों से बातचीत करना, इधर-उधर थूकते रहना अच्छा नहीं है। दातुन लगभग 12 अंगुल लंबी तथा कनिष्ठा उँगली के समान मोटी होनी चाहिए। दाँतों से चबाकर अच्छी तरह कूची बना लें। कूची से ऊपर से नीचे दाँतों का घर्षण करना चाहिए। दाँतों की सफाई करने के बाद दातुन को धोकर बीच से फाड़ लें और दोनों छोर पकड़कर मोड़ लें, इसी से जिह्वा के मल की सफाई करें। इसके बाद दाहिने हाथ के अँगूठे से तालू में घर्षण करने से तालू की सफाई हो जाती है। जिह्वा तथा तालू की सफाई का महत्व उतना ही है, जितना दाँतों और मसूड़ों का। रात्रि को सोने से पूर्व अधिकांश लोगों को दूध पीकर सोने का अभ्यास है। दूध पीकर दाँतों की सफाई न करने से दाँतों में कीड़े लग जाते हैं। अतः सोने से पहले दाँतों की सफाई दातुन, ब्रश अगदि से करनी चाहिए। प्रतिदिन दाँतों का अभ्यास आवश्यक है। इसके लिए जो खाया जाए अच्छी तरह चबाया जाना चाहिए।
6. अभ्यंग -
नित्य विधिपूर्वक तैलाभ्यंग भी महत्वपूर्ण स्वस्थवृत्त है। और दिनचर्या का अंग होना चाहिए। वाग्भट् ने तैलाभ्यंग को (1) जराहर
(2) श्रमहर,
(3) वायुविकार नाशक
(4) दृष्टिप्रसादकर
(5) आयुः पुष्टिकर
(6) निद्राजनन
(7) त्वच्य
(8) दार्डयकर कहा है और शिर, कर्ण तथा पैरो में विशेष रूप से अभ्यंग करने का निर्देश दिया है।,
प्रतिदिन तेल की मालिश करने से वायु विकार, बुढ़ापा, थकावट नहीं होती है। दृष्टि की स्वच्छता, आयु की वृद्धि, निद्रा, सुंदर त्वचा, शरीर दृढ़ हो जाता है। सिर, कान तथा पैरों में विशेषतः मालिश करनी चाहिए।
सरसों का तेल, सुगंधित तेल, पुष्पवासित और अन्य सुगंधित द्रव्यों से युक्त तेल कभी वर्जित नहीं होता। तेलों में तिल या सरसों के तेल की मालिश करना अच्छा रहता है।
तेल मर्दन की विधि सबसे पहले तेल नाभि में लगाना चाहिए, उसके बाद हाथों, पैरों के नाखूनों में, पैरों के तलवों का मालिश करने के बाद दोनों पैरों की पिंडलियों, जंघाओं, फिर दोनों भुजाओं, पीठ, गरदन, पेट, बाद में सीने की मालिश करनी चाहिए। पैरों, भुजाओं, पीठ की मालिश नीचे से ऊपर की ओर, पेट और छाती की मालिश हृदय से उपर की ओर करनी चाहिए। गरदन की मालिश उपर से नीचे की ओर करने से लाभ होता है। ग्रीष्म काल में शीतल छाया में तथा शीतकाल में धूप उपलब्ध हो सके तो धूप में ही करनी चाहिए। शीतकाल में मालिश करते समय तेज शीतल वायु का ध्यान रखें। ऐसी स्थिति में कमरे के अंदर ही मालिश करनी चाहिए। कानों में तेल डालने से वायु के रोग नहीं होते। पैर के तलवों की मालिश करने से नेत्र ज्योति बढ़ती है। प्रतिदिन न हो सके तो अवकाश के दिन अंवश्य ही मालिश करनी चाहिए। वैसे मालिश करने में अधिक समय नहीं लगता, नहाने से पहले मालिश करके क्षौर कर्म के पश्चात स्नान किया जा सकता है।
7. क्षौर कर्म-
नित्य व्यायाम के समान ही नियमित रूप से क्षौर कर्म, शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य एवं मानवोचित सौदर्य के लिए आवश्यक होने से इसका स्वस्थवृत्त में महत्व है और दिनचर्या का एक अंग है। चरक संहिता में बाल-नाखुन इत्यादि काटने को 1. पुष्टिकर, 2. वृष्टा, 3. आयुष्य 4. शुचिकर तथा 5. सौन्दर्यवर्धक कर्म कहा गया है। सुश्रुत संहिता में भी स्वस्थ तृप्त के इस कर्म को (1) पापोपशमन (2) हर्षोत्पादक (3) लाघवकर (4) सौभाग्यकर तथा (5) उत्साहवर्धक माना गया है। अतः नियमित रूप से क्षौर कर्म करना चाहिए। प्रतिदिन दाढ़ी बनाने से शरीर में स्फूर्ति आती है। जो लोग दाढ़ी रखते है, उनकों प्रतिदिन सफाई पर ध्यान रखना चाहिए महीने में एक बाद बाल कटाने चाहिए तथासंभव हो सके तीन सप्ताह में कटाएँ। सप्ताह में एक बार नख काटना आवश्यक है। दाढ़ी, नख काटने का स्वयं अभ्यास करना चाहिए। नाई से केवल केश कटाना चाहिए। उसके उस्तरे, ब्रश आदि से संक्रामण रोग की संभावना बनी रहती है। किफायत (मितत्ययता) की दृष्टि से पैसे और समय की बचत होती है। और कर्म के पश्चात स्नान करना आवश्यक है।
8. व्यायाम-
व्यायाम की परिभाषा इस प्रकार है
शरीरचेष्टा या चेष्टा स्थिरार्थ बलवर्धनी।
देह व्यायाम संख्या मात्राता तां समाचरेत्
च.सं. 7/31
शरीर की जो चेष्टा मन के अनुकूल, शरीर में स्थिरता लाने वाली और बल बढ़ाने वाली हो, उसे शारीरिक व्यायाम कहा जाता है। इसे उचित मात्रा में सेवन करना चाहिए।
जीवन रक्षा के लिए जिस प्रकार भोजन आवश्यक है, उसी प्रकार व्यायाम को हम स्वास्थ्य संजीवनी कह सकते हैं। चाभी के बिना घड़ी नहीं चलती, इसी प्रकार व्यायाम के बिना शरीर भी नहीं चलता। व्यायाम कामधेनु तथा कल्पवृक्ष के समान है। महर्षि चरक के अनुसार
लाघवं कर्मसामर्थ्यं स्थिर्यं दुःखसहिष्नुता।
दोषान्क्षयोऽग्निस्वरूपश्च व्यायामदुपजायते
च.सं. 7/32
व्यायाम करने से शरीर में हलकापन, कार्य करने की शक्ति, शरीर में स्थिरता तथा कष्ट सहने की शक्ति में वृद्धि, शरीर के विकारों का नाश एवं जठराग्नि की वृद्धि होती है।
रक्त-पित्त का रोगी, कृश, शोष, श्वास-कास, खाँसी और उरःक्षय से पीड़ित, तुरंत भोजन किया हुआ, स्त्री प्रसंग से क्षीण तथा चक्कर से पीड़ित मनुष्य को व्यायाम नहीं करना चाहिए।
व्यायाम में यौगिक व्यायाम का दोहरा लाभ है। एक ओर आसनों से शरीर बलिष्ठ और रोग रहित होता है, दूसरी ओर आत्मिक उन्नति भी होती है। कुछ समय तक नियमित यौगिक व्यायाम का अभ्यास करने से मस्तिष्क की धारण शक्ति बढ़ जाती है। स्नायु तथा मांसपेशियों में बल आ जाता है। कब्ज, बहुमूत्र रोग आदि दूर होते हैं। शरीर रोग मुक्त होकर यौवन, कांति, ओज की वृद्धि, दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
9. प्रात:कालीन प्रस्थान-
प्रातःकाल का समय शारीरिक स्वास्थ्य तथा मानसिक एवं बौद्धिक शक्तियों के संवर्धन के लिए अत्यधिक उपयोगी है। प्रातःकालीन वातावरण मधुमय होता है। इसी समय पृथ्वी से मंद-गंध, जो कि मन को लुभाने वाली होती है, निकलती है। शीतल समीर शरीर को स्फूर्ति प्रदान करती है। इस अमृतमय शीतल सुगंधित समीर के स्पर्श से शरीर में बल, तेज, ओज, कांति, स्फूर्ति, उत्साह एवं आरोग्यता का संचार होता है। चित्त प्रसन्न रहता है एवं मन में उल्लास की तरंगें उठती हैं। अतः प्रातःकाल के वातावरण में टहलना अत्यंत लाभदायक है। यह संजीवनी बूटी के समान गुणकारी है।
ऋषियों ने प्रातःकाल को ही प्राणायाम का सबसे अच्छा समय माना है। प्राणायाम के द्वारा प्राण, अपान, उदान, व्यान, समान, सभी समान अवस्था में रहते हैं।
भ्रमण कैसे किया जाए? प्रातः भ्रमण करते समय गरदन सीधी, रीढ़ की हड्डी सीधी, नीना तना हुआ, दोनों हाथ पूरी तरह हिलते रहने चाहिए। ग्रीष्म और वर्षा ऋतु में शरीर पर कम से कम वस्त्र होने चाहिए। मुँह की बजाय नाक से ही श्वास लेनी चाहिए। टहलते समय सदैव गहरे गहरे श्वास लें। किसी मित्र आदि दूसरे व्यक्ति के साथ टहलते वक्त बातचीत नहीं करनी चाहिए। तेज गति से टहलना, मंद गति से दौड़ना चाहिए। इससे गहरे श्वास स्वतः चलने लगते हैं। टहलते समय स्वास्थ्य बनाने की भावना होनी चाहिए। मेरे अंदर ओज, तेज और शक्ति का संचार हो रहा है। शरीर से संचित विकार निकल रहे हैं। युवा व्यक्तियों को दौड़ने का ही अभ्यास करना चाहिए। वृद्ध लोगों को टहलने का क्रम अपनाना चाहिए। महात्मा गांधी प्रतिदिन प्रार्थना के बाद भ्रमण किया करते थे। महर्षि दयानंद प्रतिदिन दौड़ लगाया करते थे।
प्रतिदिन स्नान करना वैदिक दिनचर्या का एक आवश्यक अंग माना गया है। खान करने से शरीर शुद्ध हो जाता है, रोम कूप खुल जाते हैं, शरीर का आलस्य तथा निद्रा रोग दूर होकर चित्त शांत होता है। उपासना, ध्यान आदि में मन लगता है तथा स्वाध्याय के प्रति रुचि हो जाती है। जठराग्नि तीव्र होकर क्षुधा को बढ़ाती है। वेद में जल को अमृत और जीवन का नाम दिया है। प्रतिदिन खान करने से बल, बुद्धि तथा स्वास्थ्य का संवर्धन होता है। शरीर में स्वच्छता और स्फूर्ति बनी रहती है।
स्रान की विधि सर्वप्रथम जल सिर पर डालना चाहिए, सिर पर जल डालने के लिए सिर नीचा करके दो-तीन लोटे जल डालना चाहिए। ऐसा करने से मस्तिष्क की गरमी पैरों से निकल जाती है। जो लोग पहले पैर धोते हैं, उनकी गरमी मस्तिष्क में चली जाती है। इससे मस्तिष्क में नाना प्रकार की व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। सिर को भिगोने के पश्चात अन्य अंगों को भिगोना चाहिए। गीले खद्दर आदि मोटे वस्त्र की सहायता से शरीर को खूब रगड़ना चाहिए। पसीना आदि दुर्गंध को मिटाने के लिए साबुन लगाकर, पुनः अच्छी तरह पानी डालकर शरीर को अच्छी तरह रगड़ना चाहिए। इससे रोमकूप खुल जाते हैं। साबुन के स्थान पर बेसन, हल्दी, सरसों के तेल का उबटन लगाकर भी शरीर की अच्छीसफाई हो जाती है। खान के बाद शरीर को अच्छी तरह सुखा लेना चाहिए।
स्रान निषेध ज्वर, अतिसार, कान के रोग, वायु रोग, अफारा, अजीर्ण तथा भोजन के बाद खान नहीं करना चाहिए। नेत्र रोग, मुख रोग तथा जुकाम में खान नहीं करना चाहिए।
11. वस्त्र धारण-
स्रान के बाद निर्मल, स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। बनियान, कच्छा, लंगोट आदि पसीने से दुर्गंधित हो जाते हैं अतः प्रतिदिन साबुन आदि से अच्छी तरह साफ करना चाहिए। निर्मल वस्त्र आयु को बढ़ाने वाला, दरिद्रता नाशक, प्रसन्नता प्रदान करने वाला और श्रेष्ठ लोगों के मध्य बैठने के योग्य बनाता है।
शीतकाल में मनुष्यों को वायु और कफ हरने वाले रेशमी, ऊनी, लाल तथा कई रंगों वाला कपड़ा पहनना चाहिए। कषाय वस्त्र मेधा के लिए हितकारी, शीतल तथा पित्तनाशक होता है। अतः यह ग्रीष्मकाल में पहनना चाहिए। सफेद वस्त्र सुखद, शीत और धूप को रोकने वाला, न अधिक उष्ण न अधिक शीतल होता है। इसे वर्षा ऋतु में धारण करना चाहिए। किसी दूसरे का धारण किया हुआ, पुराना, मैला, अत्यंत लाल कपड़ा नहीं पहनना चाहिए। कपड़ा, जूता किसी दूसरे का धारण किया हुआ प्रयोग नहीं करना चाहिए।
12. संध्याओपासना एवं योगाभ्यास-
प्रतिदिन प्राणायाम, सूर्योपासना एवं गायत्री जप तथा इष्टदेव का अभिषेक करना चाहिए। प्रातः काल के दर्शन में पूजा का सबसे बड़ा महत्व है। स्वप्न देखने के कारण सद्गृहस्थी में आयु, बुद्धि, यश, कीर्ति और ब्रह्मवर्चस की वृद्धि पाई जाती है। प्रातःकाल गायत्री मंत्र का जाप करने से पापों का क्षय होता है। सद्बुद्धि, आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, द्रविणं, ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति होती है। जीवन के लिए आराधना अनिवार्य आवश्यकता है। शरीर के भोजन की सबसे अधिक आवश्यकता है।
यदि संध्या को जीवन का आधार कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। संध्या से शारीरिक स्वास्थ्य, बुद्धि, मेधा और दीर्घायु प्राप्त होती है। संध्या में प्राणायाम भी किया जाता है। प्राणायाम के द्वारा प्राण, उदान, व्यान, अपान, समान तथा पाँच उपप्राण नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय आदि दसों प्राण नियंत्रित रहते हैं। प्राणायाम के द्वारा इंद्रियों के समस्त विकार दूर हो जाते हैं, फेफड़ों को शक्ति मिलती है, मानसिक शक्ति बढ़ती है तथा मन और इंद्रियाँ वश में हो जाती हैं।
13. स्वाध्याय-
स्वाध्याय मनुष्य जीवन का बड़ा तप है, इसमें सदाचार की प्रेरणाएँ मिलती हैं। वैसे तो स्वाध्याय सभी आश्रमों के लिए आवश्यक है परंतु ब्रह्मचर्याश्रम में इसका अधिक महत्व है। स्वाध्याय का तात्पर्य धार्मिक ग्रंथों का स्वाध्याय प्रतिदिन 5 पेज 15 मिनट में करें तो एक माह में 150 पेज तथा एक वर्ष में 1825 पृष्ठ का (12 पुस्तक 150 पेज की स्वाध्याय किया जा सकता है। स्वाध्याय में प्रमाद नहींकरना चाहिए। जिस प्रकार श्वास-प्रश्वास तथा हृदय प्रतिदिन प्रतिक्षण चलता रहता है उसी प्रकार स्वाध्याय का क्रम भी नाहीं टूटना चाहिए। स्वाध्याय से ही विद्वान बनते हैं एवं आंतरिक ज्ञान ज्योति जाग्रत होती है। स्वाध्याय के द्वारा मनुष्य ज्ञान की चरम सीमा तक पहुँच सकता है। इसी से मनुष्य यश, कीर्ति, गौरव प्राप्त करता है।
14. भोजन -
प्रत्येक मनुष्य का भोजन देश, काल, आयु, प्रकृति, कार्य के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है। स्वास्थ्य तभी ठीक रह सकता है, जबकि यथोचित मात्रा में देश, काल, प्रकृति, कार्य के अनुसार भोजन मिले। उचित मात्रा में भोजन न मिलने से शरीर रोगी हो जाता है, क्योंकि आंतरिक अंगों पर दुष्प्रभाव पड़ता है।
आहार के संबंध में मुख्यतः पाँच सूत्र हैं
क्या खाएँ - कितना खाएँ-कब खाएँ
क्यों खाएँ - कैसे खाएँ।
क्या खाएँ - मनुष्य को सदैव हितकारी पदार्थों का सेवन करना चाहिए। भोज्य पदार्थों को चार भागों में विभक्त किया जा सकता है
क- कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं, जिन्हें विष के समान मानकर छोड़ देना चाहिए जैसे चरस, गाँजा, भाँग, अफीम आदि।
ख- कुछ हानिकारक वस्तुएँ हैं, जिनका सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इनके सेवन से शरीर में विषाक्तता बढ़ती है जैसे शराब, चाय, कॉफी, पान, तंबाकू आदि तथा अंडे, मांस, मछली, धूम्रपान आदि मानसिक क्षमता को कम करते हैं। मांसाहार तामसिक पदार्थ हैं।
ग- कुछ वस्तुएँ जीवनोपयोगी होती हैं, जैसे गेहूं, चावल, मक्का, बाजरा, दालें, क्रीम, मक्खन आदि।
घ- इनमें दुग्ध, घी, दही, सभी प्रकार के फल, साग-सब्जी, मूली, गाजर आदि का संयोग करना चाहिए। सदैव भोजन ताजा लेना चाहिए।
कितना खाएँ- सदैव भूख से कम खाना चाहिए। अधिक भोजन करने वालों की आयु कम होती है तथा अल्प भोजन करने वाले दीर्घजीवी होते हैं। कम खाने से कभी पाचन संस्थान संबंधी रोग नहीं होता है। जब भी पाचन संस्थान के रोग होते हैं, अधिक खाना उनमें प्रमुख कारण होता है।
कब खाएँ- भोजन अग्निहोत्र की भाँति दो ही समय करना चाहिए। प्रथम भोजन 12 बजे से पूर्व तथा द्वितीय भोजन सायंकाल 7 बजे तक कर लेना चाहिए। आयुर्वेद में दो बार भोजन करने का विधान है। अपने भोजन का समय निश्चित और उचित मात्रा में करने से भोजन समय से पच जाता है। भोजन भूख लगने पर ही किया जाना चाहिए। बिना भूख लगे भोजन करने से हम रोगों को निमंत्रण देते हैं।
क्यों खाएँ - भोजन करने का उद्देश्य है अपने शरीर को स्वस्थ, निरोग और बलवान बनाना। भोजन सदैव स्वस्थ और जीवित रहने के लिए किया जाना चाहिए न कि खाने के लिए जीना।
कैसे खाएँ - भोजन इस प्रकार खाया जाना चाहिए, जिसमें जठराग्नि को कम से कम श्रम करना पड़े। हमारे मुख में 32 दाँत होते हैं। अतः प्रत्येक ग्रास इतनी बार तक चबाना चाहिए, जिससे पतला हो जावे, तभी उसका घूँट गले के नीचे उतारना चाहिए। कहा गया है भोजन को पीना चाहिए तथा पानी को खाना चाहिए।
भोजन के सामान्य नियम
1. भोजन जहाँ तक हो सके एकांत में करना चाहिए। साथ में यदि कोई हो तो साथ-साथ भोजन करें।
2. भोजन करते समय मौन रहना चाहिए। भोजन करते समय बातें करने से कई बार श्वास नली में अन्न कण चले जाने से खाँसी आने लगती है।
3. भोजन करते समय यह भावना करनी चाहिए कि जो हम ग्रहण कर रहे हैं उससे सत्कर्म, सद्विचार, सद्भावनाएँ उत्पन्न हों, भोजन हमारे शरीर को आरोग्यता प्रदान करे।
4. भोजन करने से पूर्व हाथों की अच्छी तरह सफाई करें, यदि संभव हो सके तो पैरों को भी धोकर भोजन करना चाहिए।
5. भोजन करते समय वस्त्र ढीले होने चाहिए, ऐसे वस्त्र जो पेट आदि को कसे हों उतार देना चाहिए।
6. भोजन करने के उपरांत तत्काल मूत्र त्याग करना चाहिए, इससे मूत्रवाही संस्थान के रोग नहीं होते।
7. भोजन करने के बाद दाँतों में फंसे हुए अन्न आदि के कणों को नीम की काड़ी, चाँदी, ताँबा की बनी दाँत साफ करने की काड़ी मिलती है, उससे साफ करके अच्छी तरह कुल्ला करना चाहिए।
रात्रिचर्या - दिनचर्या एवं संध्याकाल के सभी आचरण पूर्ण करने के प्रश्चात रात्रि भोजन, शयन, निद्रा एवं स्वप्न, व्यायाम एवं गर्भाधान, रजस्वलाचर्या तथा ब्रहमचर्यादि पान ये सभी स्वस्थवृत संबंधी रात्रिचर्या के अंग है।
एतानि पंचकर्माणि सयायं वर्जयेद्दबुधः।
आहारं माहिष्ं निद्रां संपाठं गतिमध्वनि
भा.प्र. 5/275
बुद्धिमान व्यक्ति सायंकाल भोजन, मैथुन, नींद, पढ़ना और मार्ग गमन इन पाँच कार्यों को त्याग दे, क्योंकि उस समय भोजन से व्याधि, मैथुन से गर्भ में विकार, नींद से दरिद्रता, पढ़ने से आयु की हानि एवं मार्ग गमन से भय होता है।
1. सामान्य नियम - रात्रि के पूर्व 1 से 3 प्रहर और अंतिम 1 से 3 प्रहरों को वेदाभ्यास द्वारा व्यतीत करें। शेष दो प्रहरों में 6 घंटे सोने वाला ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति करता है।रात्रि के प्रथम प्रहर में ही भोजन कर लेना चाहिए तथा भोजन दिन की अपेक्षा कुछ कम खाना चाहिए। देर से पचने वाले गरिष्ठ पदार्थों को न खाएँ। भोजन करने, सोने के समय में न्यूनतम दो-तीन घंटे का अंतर होना चाहिए, तत्काल भोजन करके सो जाने से पानी पीने का अवसर नहीं मिलता। भोजन करने के बाद, सोने से पूर्व एक-एक घंटे के अंतर से कम से कम दो या तीन बार पानी पीना चाहिए। इससे भोजन पचने में भी सहायता मिलती है, रात्रि में अपच होने की संभावना नहीं रहती तथा निद्रा भी अच्छी आती है, प्रातः शौच भी साफ हो जाता है। सोने से पूर्व उष्ण पेय, चाय, कॉफी आदि पीने से निद्रा अच्छी नहीं आती। अच्छी नींद न आने से प्रातः उठने पर शरीर में थकावट रहती है, स्रान तथा व्यायाम आदि करने का मन नहीं होता।
रात्रि में सोने से पूर्व दाँतों की सफाई करना आवश्यक है। अधिकांश व्यक्ति दूध पीकर सो जाते हैं, ऐसे लोगों के दाँतों में जल्दी ही कीड़े आदि लग जाते, खराब हो जाते हैं। प्रतिदिन जैसे शरीर की स्स्रान द्वारा सफाई की जाती है और कपड़ों की धुलाई साबुन तथा पानी से होती है, उसी प्रकार नेत्रों की सफाई के लिए प्रतिदिन रात्रि को सोने से पहले नेत्रों में अंजन करने का विद्वान है।
2. शयन विधि- रात्रि में सोने से पूर्व वस्त्रों की स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। जो वस्त्र हम सारे दिन पहने रहें, उसे पहन कर सोना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। सोने से पहले वस्त्रों को बदल लेना चाहिए तथा सोते समय किसी अंग पर कोई दबाव नहीं पड़ना चाहिए। इसलिए वस्त्र ढीले पहनने चाहिए। इसी प्रकार बिस्तर भी स्वच्छ हो। जहाँ तक हो सके अपना बिस्तर अलग रखना चाहिए। किसी दूसरे के बिस्तर का उपयोग किसी विशेष परिस्थिति में ही करें। अध्यात्मवादी व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में उपयोग आने वाले सामान साथ रखते हैं। आज जो संक्रामक बीमारियाँ फैल रही हैं, उनमें मुख्य कारण यह भी है। आज वर्तमान समय में आलस्य- प्रमाद के कारण व्यक्ति परावलंबी होकर चलते हैं किंतु ऋतु परिवर्तन के अनुसार अपना बिस्तर साथ रखा जाए। दूसरे के इस्तेमाल किए हुए वस्त्रों में रोग संक्रमण एवं जो कुसंस्कार घर कर जाते हैं, उनसे हमारा सूक्ष्म एवं कारण शरीर प्रभावित होता है। आज के युग में बिस्तर में मोटे गद्दों आदि का उपयोग किया जाता है, यह सर्वथा स्वास्थ्य के लिए अनुकूल नहीं है।
हर व्यक्ति के लिए चारपाई या तख्त अलग होना चाहिए। सोने वाला कमरा हवादार होना चाहिए। खिड़कियाँ बंद करके सोना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। कई बार सर्दियों में लोग कोयले की अंगीठी आदि कमरे को गरम करने के लिए रख लेते हैं। ऐसा करने से कार्बन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इस स्थिति में लोग सोते के सोते रह जाते हैं। अतः सोने से पहले शुद्ध वायु के आवागमन का ध्यान रखना चाहिए।
3. तत्व बोध की साधना- सोने से पूर्व तत्वबोध की साधना शिथिलीकरण की मुद्रा में करनी चाहिए। दिनभर के कार्यों की समीक्षा करनी चाहिए। ऐसा करने से निद्रा अच्छी आ जाती है। सोने से पूर्व यह भावना करें कि शरीर के पंचतत्व अपने मूलतत्व में विलीन हो रहे हैं। हमारे आज के जीवन का अंत हो रहा है।
4. भूलों के लिए क्षमापश्चाताप - प्रायश्चित जैसे क्रम बनाने चाहिए। इसके बाद विचार करना चाहिए कि निद्रा भी एक प्रकार की मृत्यु है। संसार का और अपने स्थूल शरीर का अस्तित्व बोध उस बीच समाप्त हो जाता है। संसार, घर-परिवार इन सबकी रक्षा सोता हुआ व्यक्ति नहीं कर सकता। इसे मृत्यु स्थिति मानकर सब कुछ परमात्म चेतना को सौंपकर निश्चत भाव से नींद (मृत्यु) की गोद में जाने की मनोभूमि बनाना चाहिए। अब शांति से चादर ओढ़कर लेट जाएँ, दोनों हाथ आधी मुट्ठी बंद, छाती के ऊपर रखें। ध्यान मुद्रा में आँखें बंद कर लें। इस प्रकार सब प्रभु को सौंपकर स्वयं भी उसकी गोद में जाना चाहिए।
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