Menstruation and health ( ऋतुचर्या एवं स्वास्थ )



इससे पूर्व इकाई में स्वास्थ, स्वस्थवृत्त, स्वस्थवृत्त प्रयोजन, दिनचर्या, रात्रिचर्या, ब्रह्मचर्य, पर विस्तृत चर्चा की। प्रस्तुत इकाई में हम ऋतुचर्या के बारे में चर्चा करेंगे तथा इसके बारे मे विस्तार से जानेंगे। स्वस्थवृत्त मे ऋतुचर्या का भी प्रमुख स्थान है तथा इसका सीधा सम्बन्ध स्वास्थ से है।

ऋतुचर्या

श्रेष्ठ पुरूष स्वास्थ्य को प्राप्त करना चाहते हैं। आयुर्वेदशास्त्र में ऋतुचर्या, दिन चर्या तथा रत्रिचर्या की जो विधि वर्णित की गयी है, उसका नियमपूर्वक आचरण करने से मनुष्य सदा स्वस्थ रह सकता है। ऋतुओं के लक्षणों, से पूर्णरूप से अवगत हो जाने के उपरान्त उनके अनुकूल आहार, विहार का सेवन करना चाहिए, अतः ऋतुचर्या के वर्णन से पूर्व ऋतु विभाग का संक्षिप्त ज्ञान होना आवश्यक है।

माघ के बारह महीनों में दो-दो मास की छः ऋतुयें होती है।
(1) शिशिर - माघ, फाल्गुन (16 जनवरी से 15 मार्च तक)
(2) बसंत - चैत, वैशाख (16 मार्च से 15 मई तक)
(3) ग्रीष्म- ज्येष्ठ, आषाढ़ (16 मई से 15 जुलाई तक)
(4) वर्षा- श्रावण, भादों (16 जुलाई से 15 सितम्बर तक)
(5) शरद- अश्विन, कार्तिक (16 सितम्बर से 15 नवम्बर तक)
(6) हेमन्त अगहन या मार्गशीर्ष, पूस या पौष (16 नवम्बर से 15 जनवरी तक)

प्रकृतिकृत शीतोष्णादि सम्पूर्ण काल को ऋषियों ने एक वर्ष में संवरण किया है। चन्द्रमा और सूर्य को काल-विभाजक मानकर, वर्ष को दो भागों में बाँटा गया है। जिन्हें 'अयन' कहते है।
ये अयन दो है- (1) उत्तरायन (2) दक्षिणायन। दो अयन के मिलने से एक संवत्सर बनता है। निमेष से लेकर युग तक चक्रवत् घूमता हुआ यह काल 'कालचक्र' कहलाता है। छह ऋतुओं में से वर्षा, शरद और हेमन्त को दक्षिणायन तथा शिशिर, बसन्त और ग्रीष्म को उत्तरायण कहते है। दक्षिणायन वर्षा, शरद, हेमन्त (विसर्ग काल)

उत्तरायण शिशिर, बसन्त, ग्रीष्म (आदान काल)


उत्तराचण में रात्रि छोटी तथा दिन बडे होने एवं सूर्य-रश्मियों के प्रखर होने से चराचर की शक्ति का शोषण होता है, इसलिए इसे आदान काल भी कहा गया है और दक्षिणायन में दिन छोटे तथा रात्रि बड़ी होने से चन्द्रमा की मरीचिकाएँ प्रबल होती है, जिनसे प्राणियों को बल प्राप्त होकर पोषण का कार्य स्वाभाविक रूप से स्वतः ही होता रहता है।विसर्ग काल में वायु अधिक रूक्ष नहीं बहती। विसर्गकाल में चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों से सृष्टि को पूर्ण करते हुए सतत पुष्टि प्रदान करता है। इसलिए विपरीत आदान काल में वायु रूक्ष होती है, सूर्य बली होता है। अतः आदान काल कहलाता है। इस काल में जीवों में दुर्बलता आती है।
चरक संहिता में कहा गया है।

मध्ये मध्यबलं, त्वन्ते श्रेष्ठमग्रे च निर्दिष्ट। 
आदावन्ते च दौर्बल्यं विसर्गदानयोर्ततानाम् ॥
(च.सं. 6/8)

अर्थात आदान और विसर्ग कालों में से प्रत्येक के मध्य में मध्यबल, विसर्ग के अन्त तथा आदान के आदि में श्रेष्ठ बल होता है एवं विसर्ग के आदि में तथा आदान के अन्त में दुर्बलता बढ़ती है।

ऋतु परिर्वतन, ऋतुसन्धि एवं स्वास्थ्य-

ऋतुओं के प्रभाव से उनके गुण, दोषों का निवारण, प्रकोप एवं प्रशम होता रहता है। और डायनासोर ही मनुष्य को स्वास्थ्य संरक्षण यथायोग्य औषधि अन्न-विहार निर्भय सीज़नचर्या का पालन करना चाहिए।
ऋतुओं का शरीर की जैविक अवस्था तथा त्रिदोषो पर प्रबल प्रभाव पड़ता है।। इसलिए आयुर्वेद में विभिन्न ऋतुओं तथा ऋतुसन्धियों के लिए विशेष आहार-विहार बताया है, जिसे हम 'ऋतुचर्या' कहते है। ऋतुचर्या का पालन करने वाले व्यक्ति में दोषों तथा शरीर की अन्य क्रियाओं पर परिर्वतनशील ऋतुओं का अधिक प्रभाव नहीं हो पाता है और व्यक्ति में 'ऋतुक्षमित्व' बना रहता है। वात-पित्त-कफ का ऋतुकाल संचय-प्रकोप-प्रशमन सीमित कम में रहे और दोष साम्य बना रहे, यही ऋतुचर्या का उद्देश्य है। इसी उद्देश्य को तप्त प्रभाव वाले औषध अन्न-विहार का सेवन उन ऋतुओं में करना चाहिए। 'ऋतुसंधि' अर्थात ऋतु परिर्वतनकाल (व्यतीत होने वाले ऋतु का अंतिम सप्ताह तथा आने वाली ऋतु का प्रथम सप्ताह) ऋतु संधि कहलाता है।इस काल में जाने वाली ऋतु की विधि का त्याग करना चाहिए ताकि सहसा त्याग या प्रयोग से समात्मम्यजन्य रोग न होने पाये।

1. हेमन्त ऋतुचर्या-

हेमन्त ऋतु में तुषार से प्रायः आच्छन्न रहता है, दिशाएँ धूल-धूसरहित होती है तथा शीतल पवन चलती है। रात्रि अन्य ऋतुओं की अपेक्षा दीर्घ होती है। इस ऋतु में अधिक शीत वायु के कारण रूकी हुई अग्नि देह के अंदर उसके छिद्रो से प्रेरित होकर अपने स्थान में, संचित होकर प्रचण्ड हो जाती है, इसलिए हेमन्त में वायु तथा अग्नि नाशक विधि का उपयोग श्रेष्ठ माना गया है। जठराग्नि बलवान् होकर मात्रा और द्रव्य में गुरू आहार को पचाने में समर्थ रहती है।

स यदा नेन्धनं युवां लभते दहजन्तदा। 
रसं हिंसातो वायुः शीत प्रकुप्यति॥

वायु प्रकोप- इस प्रकार के अग्नि के प्रबल होने पर जब उसके बल के अनुसार ईंधन (गुरू आहार) नहीं मिलता, तब अग्नि शरीर में उत्पन्न प्रथम धातु (रस) को जला डालती है। अतः वायु का प्रकोप हो जाता है।

आहार- हेमन्तऋतु (तुषारकाल) में अग्नि की प्रबलता रहती है। अतः स्रिग्ध पदार्थ, अम्ल रस, लवणरस, अति मेदस्वी वस्तु का सेवन करना चाहिए। हेमन्त ऋतु में दूध के विकार मात्र (दूध से बने सभी पदार्थ) ईख के विकार (गुड़, चीनी, मिश्री, आदि), वसा, तेल नये चावलों का भात और गरम जल का सेवन करने में आयु हानि (रोगोत्पत्ति द्वारा) नही होती।

वर्जनीय आहार- शीतकाल आ जाने पर वातवर्द्धक एवं लघु अन्न-पान, प्रवात (तीव्रवायु,) प्रमिताहार (थोडा नपा-तुला भोजन) और जल के घुले सत्तू का सेवन नहीं करना चाहिए। 

विहार- तैल का अभ्यंग, उबटन, धूप सेवन, शरीर पर भारी और गरम वस्त्र धारण करना, कठोर श्रम, तेल मालिश, केशर व कस्तूरी का लेप आदि कर्म हितकर है। साथ ही शीतल जल में स्रान, नदी के जल का पान, दिन में निद्रा, ठंडे स्थानो में विहार तथा खुले छप्परों में निवास त्याग दें।

शिशिर ऋतुचर्या

सामान्य रूप से हेमन्त और शिशिर दोनों ऋतुएँ यद्यपि समान होती है किन्तु शिशिर में कुछ विशेषता होती है। आदान काल होने से शिशिर ऋतु में रूक्षता आ जाती है तथा मेघ, वर्षा के कारण विशेष शीत पड़ने लगती है। अतः शिशिर ऋतु में भी हेमन्त ऋतु का ही सब विधियों का पालन करना चाहिए। विशेष रूप से निवात (तीव्र वायु रहित) तथा उष्ण गृह में निवास करना चाहिए।
वर्ज्य आहार - शिशिर ऋतु में भी वे पदार्थ वर्ज्यनीय है जो हेमन्त ऋतु में बताये गये है। शिशिर ऋतु में कटु-तिक्त-कषाय रस तथा वात वर्धक, हल्के और शीतल अन्न पान का त्याग कर देना चाहिए।

बसंत ऋतुचर्या-

बसन्त ऋतु में सभी दिशाएं रमणीय एवं नाना प्रकार के पुष्पों से सुशोभित होती है, इस समय शीतल-मन्द-सुगन्ध पवन प्रवाहित होती है, अपनी इस अनुपम सुषमा एवं मनोहरता के कारण ही यह 'ऋतुराज' कहलाता है।

वसन्त ऋतु में सूर्य की रश्मियों द्वारा तप्त होकर कफ जलस्वरूप होकर जठराग्नि को नष्ट (मन्द) करके अनेक रोगों की उत्पत्ति करता है, अतः स्वास्थ का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

सेवनीय आहार-विहार कफ निःसारक औषधियों के द्वारा वमन तथा ऊध्र्वांग शुद्ध करें, व्यायाम करना, उबटन लगाना, रूखे, कषैले, कटु, तिक्त, रस, ताम्बूल, कर्पूर, मधु के साथ हरितकी चूर्ण सेवन करें, प्रातः सांय भ्रमण करें। भ्रमण से कफ का ह्रास एवं रक्त संचार तीव्र गति से होता है। सोंठ का क्वाथ तथा विजयसार से बना जल पीये, मधुमिश्रित जल तथा नागर मोथा से बना क्वाथ पीयें।

वर्ज्य आहार-विहार- इस ऋतु में मधुर, अम्ल, स्निग्ध तथा गरिष्ठ (देर से पचने वाले) पदार्थ, शीत द्रव्य, तथा दिन में शयन, ओस में निद्रा लेना वर्जित है।

ग्रीष्म ऋतुचर्या

ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणें बहुत ही तीक्ष्ण होती है, अतः इनसे प्राणियो का बल एवं जगत् की आर्द्रता का शोषण होता है, इसके अतिरिक्त परिणाम स्वरूप कफ क्षीण हो जाता है और शरीर में वायु संचित होकर वृद्धि को प्राप्त होता है, जिससे विविध प्रकार के रोग उत्पन्न होते है।

सेवनीय आहार-विहार- इस काल में मधुर रस तथा शीत वीर्य वाले द्रव्य, द्रव तथा स्रिग्ध अन्नपान, चीनी के साथ शीतल मद्य, घी, दूध, चावल, इनका सेवन करना चाहिए, जिससे बल का नाश नहीं हो पाता। खस से आच्छादित घर, सघन वृक्षों की छाया, प्रातः शीतल जल से स्रान तथा दिन में निद्रा-इस ऋतु की उग्रता का शान्त करते है, गुड़ के साथ हरीतकी का सेवन करना चाहिए।वर्ज्य आहार-विहार- अधिक लवण युक्त, कटु, अम्ल पदार्थ, अधिक व्यायाम, उष्ण जल से सान, उपवास, धूप में पदयात्रा करना, अधिक परिश्रम, तिल-तेल, बैगन, उड़द, सरसों का शाक, गरिष्ठ भोजन, भय, क्रोध, मैथुन, एवं उग्र वायु-सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद है।

वर्षा ऋतु चर्या-

आदान-काल में मनुष्यों का शरीर अत्यन्त दुर्बल रहता है। दुर्बल शरीर में एक तो जाठराग्नि दुर्बल रहती है, वर्षा ऋतु आ जाने पर दूषित वातादि दोषो से जठराग्नि और दुर्बल हो जाती है। इस ऋतु में भूमि से वाष्प (भाप) निकलनें, आकाश से जल बरसने तथा जल का अम्ल विपाक होने के कारण जब अग्नि का बल अत्यन्त क्षीण हो जाता है, तब वातादि दोष कुपित हो जाते है। अतः वर्षाकाल में साधारण रूप से सभी विधियों का पालन करना चाहिए।

वर्ज्य आहार-विहार- वर्षा ऋतु मे जल मे घुला हुआ सत्तु, दिन मे सोना, नदी तट का वास, नदी का जल, व्यायाम, अधिक परिश्रम, धूप मे बैठना, रूक्ष द्रव्यों का सेवन, स्त्री सहवास आदि त्याज्य है। सेवनीय आहार-विहार- वर्षा ऋतु में खाने-पीने को सभी चीजें बनाते समय उसमें मधु अवश्य मिला देना चाहिए। वात और वर्षा से भरे उन विशेष शीतवाले दिनों में अम्ल तथा लवण रस वाले और नेह द्रव्यों (घृतादि) की प्रधानता भोजन में रहनी चाहिए। जठराग्नि की रक्षा चाहने वाले पुरूषों को पुराने जौ, गेहूँ और चावल का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। इस ऋतु में माहेन्द्र (आकाश का) जल, गर्म करके शीतल किया हुआ जल, कूप या सरोवर का जल पीना चाहिए। देह घर्षण, उबटन, स्नान, गन्ध का प्रयोग और इत्रादि से सुगन्धित हल्के और पवित्र वस्त्र धारण करना चाहिए। इन दिनों खट्टे, लवण युक्त का भी प्रयोग कर सकते है साथ ही क्लेद रहित सुखे स्थान पर रहना चाहिए।

शरद ऋतुचर्या

इस ऋतु में सूर्य का वर्ण पीला और उष्ण होता है। आकाश निर्मल तथा मेघों से युक्त होता है। तालाब कमलो एवं हंसों से युक्त होकर पृथ्वी वृक्षों से शोभायमान होती हैं। तलाबो सरिता आदि का जल स्वच्छ होता है। दिन में सूर्य की किरणों से तप्त एवं गत को चन्द्र रश्मियों से शीत होकर, अगस्त्य तारा के उदय से निर्विष हो जाता है जो कि न अभिष्यन्धी और न रूक्ष होकर अमृत के समान कहा गया है।
यह ऋतु स्वास्थ की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है, इसलिये ऋषियों ने शतायु की कामना करते हुए सौ शरद ऋतुओं के जीने की इच्छा व्यक्त की है।
वर्षा काल में वात विकार से बचने हेतु जब उष्ण खान पान अधिक किया जाता है, तब पित्त संचित होता रहता है, वह इस ऋतु में सूर्य की किरणों के तीक्ष्ण होने से तुरंत कुपित होकर शरीर में पित्त-प्रकोपजन्य अनेक प्रकार की व्याधियाँ उत्पन्न कर देता है।
सेवनीय आहार-विहार- अच्छी भूख लगने पर रस में मधुर, गुण में लघु, वीर्य में शीतल, कुछ तिक्त रस युक्त एवं पित्त को शान्त करने वाले अन्न-पान का मात्रापूर्वक सेवन करना चाहिए। सामान्यतः सभी को चावल, गेहूँ का सेवन करना चाहिए और कुष्ठाधिकार में बतायें हुए तिक्त द्रव्य, घृत-सेवन, विरेचन और रक्त मोक्षण क्रिया करनी चाहिए।

त्याज्य आहार-विहार-
शरद ऋतु में धूप का सेवन, वसा (चीं) तैल, ओस, मछली आदि क्षार, दही का सेवन और दिन का शयन अति मैथुन, रात्रि जागरण, धूप में चलना, एवं पूर्वी वायु का सेवन नहीं करना चाहिए।

हंसोदक- दिन में सूर्य की किरणों से तप्त, रात्रि में चन्द्रमा की किरणों से शीतल शरद ऋतु काल से पक्व अर्थात दोष मुक्त अगस्त्य नक्षत्र द्वारा निर्विषीकृत अथर्थात विष रहित शरद ऋतु का निर्मल और पवित्र जल 'हंसोदक' कहलाता है। यह स्रान, अवगाहन एवं पान हेतु अमृत के समान हितकर होता है।

षड्ऋतुओं में संशोधन क्रम
छः ऋतुओं में स्वभातः होने वाले त्रिदोषों के संचय, प्रकोप व प्रशमन का विचार करके स्वस्थवृतक
संशोधन कर्म निम्नलिखित क्रम से करना चाहिए-

षड्रसों के सेवन के विषय में ऋतुचर्या निर्देश करते हुए आचार्य सुश्रुत ने कहा है कि जिन-जिन ऋतुओं में प्राणियों के जो-जो दोष प्रकुपित रहते है, उन-उन ऋतुओं में उन-उन दोषों के शामक रस हितकारी होते हैं। वाग्भट ने इस संदर्भ में निम्नलिखित सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है-
1) शीत, वर्षा ऋतु आहार आदि के तीन रस अर्थात् मधुर-अम्ल-लवण
2) वसन्त ऋतु आहार अन्त के तीन रस अर्थात कटु तिक्त - कषाय
3) ग्रीष्म ऋतु- मधुर
4) शरद ऋतु मधुर, तिक्त, कषाय
5) शरद, वसन्त रूक्ष द्रव्य
6) ग्रीष्म, शरद शीत द्रव्य

वायु प्रवाहः जिस प्रकार ऋतुओं का महत्व है उसी प्रकार प्रत्येक ऋतु मे चलने वाली हवा का महत्व है जिससे हमारा स्वास्थ प्रभावित होता है। किस मौसम मे किस दिशा की हवा अच्छी होती है यह निम्नवत् है-
1. शिशिर ऋतु में पूर्व दिशा की हवा स्वास्थप्रद होती है।
2. बसंत ऋतु मे दक्षिण दिशा की हवा स्वास्थप्रद होती है।
3. ग्रीष्म ऋतु में नैऋत्य दिशा की हवा स्वास्थप्रद होती है।
4. वर्षा ऋतु मे पश्चिम दिशा की हवा स्वास्थप्रद होती है।
5. शरद ऋतु मे वायव्य दिशा की हवा स्वास्थप्रद होती है।
6. हेमन्त ऋतु मे अग्ने इशाशा की हवा स्वस्थ्यप्रद है।
इस प्रकार से आपने सम्पूर्ण ऋतु चर्या एवं उससे होने वाले प्रभावित स्वास्थ के वारे में विस्तार से जाना जिससे ऋतुकाल एवं स्वास्थ्य का सम्बन्ध का ज्ञान होता है। तथा स्वस्थ्य वृत्त में इसकी महत्ता प्रकट होती है।

0 Comments

Post a Comment

Post a Comment (0)

Previous Post Next Post