इस इकाई में आहार के विभिन्न घटकों की जानकारी दी जा रही है। आहार के घटकों का शरीर के विभिन्न अंग अवयवों के वृद्धि विकास में क्या योगदान है? इन सभी पहलुओं के बारे में यहाँ विस्तारपूर्वक चर्चा की जायेगी।
कोई भी पदार्थ जब अन्न मार्ग से ग्रहण किए जाने पर जीवनी शक्ति उत्पन्न करे, धातुओं का पोषण करें, उनकी रक्षा और क्षतिपूर्ति करे, जीवन की प्रक्रिया को संयमित करें तथा शरीर के महत्वपूर्ण अंशों की पूर्ति में सहायक हो, उसे आहार कहते है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए देश, काल, आयु आदि के आधार पर आहार विधि तथा मात्रा आदि का निर्णय करना चाहिए।
उपयुक्त आहार ही शरीर के समुचित विकास तथा सुख एवं स्वास्थ्य का हेतु है। अन्न को प्राणियों का प्राण कहा गया है। आहार से बल, वर्ण तथा ओजस् की प्राप्ति होती है। इस प्रकार आहार, स्वस्थ तथा रोगी दोनों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। इस इकाई में आप आहार के प्रमुख घटक, उनके स्रोत, उपयोग तथा आवश्यक मात्रा आदि के विषय में सामान्य जानकारी प्राप्त करेंगे।
आहार के प्रमुख घटक
आहार एक ऐसा तत्व है जो शरीर की सामान्य वृद्धि, संतुलन एवं शरीर की टूटी-फूटी कोशिकाओं की मरम्मत के लिए आवश्यक है। आहार के प्रमुख घटक इस प्रकार है।-
(1) प्रोटीन
(2) कार्बोहाइड्रेट
(3) वसा
(4) विटामिन
(5) खनिज पदार्थ
(6) जल
प्रोटीन
'प्रोटीन' शब्द ग्रीक भाषा के प्रोटीओं से लिया गया है, जिसका अर्थ है, 'पहले आने वाला'
सभी जीवित पदार्थों, वनस्पति, जन्तु यहाँ तक कि अणुजीवों में भी प्रोटीन की उपस्थिति होती है, शरीर की सभी कोशिकाओं तथा पित्त व मूत्र को छोड़कर सभी द्रवों में प्रोटीन उपस्थित होता है प्रत्येक कोशिका के द्रव विहीन भार का आधे से अधिक भाग प्रोटीन के रूप होता है। यह प्रोटीन एण्टीबॉडीज, हारमोन्स व एन्जाइम के रूप में रहता है।
प्रोटीन की रासायनिक संरचना व संघटन-
प्रोटीन की रासायनिक रचना बहुत ही जटिल होती है। प्रोटीन की रचना कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन व सल्फर आदि से होती है तथा कुछ प्रोटीन आयरन व आयोडीन आदि भी रखते है। कुछ प्रोटीन के अणुओं में फॉस्फोरस की उपस्थिति होती है। प्रोटीन साधारण रचना वाले यौगिकों से बने होते हैं जिन्हें एमीनों अम्ल कहा जाता है। लगभग दो दर्जन एमीनों अम्ल होते है। प्रोटीन के पाचन के दौरान प्रोटीन टूटकर प्रोटीयोज, पेप्टोन पेप्टाइडस- एमीनोंअम्ल में परिवर्तित होकर आवशोषित होता है। फिर शरीर में आवश्यकता के अनुसार एमीनों अम्ल पुनः आपस में मिलकर कई प्रोटीनों का निर्माण करते हुए शरीर की वृद्धि तथा पुर्नस्थापन का कार्य करते है। उपयोगिता के आधार पर एमीनों एसिड का वर्गीकरण किया जा सकता है।
(1) आवश्यक अमीनों एसिड (Essential Amino Acid)
(2) आंशिक रूप से आवश्यक अमीनों एसिड (Semi-essential Amino Acid)
(3) अनावश्यक ( Non essential Amino Acid)
वास्तव में सभी अमीनों एसिड हमारे लिए आवश्यक होते है, परन्तु कुछ अमीनों एसिड का हमारे शरीर में नाइट्रोजन की उपस्थिति में निर्माण हो जाता है, जबकि अन्य अमीनों एसिड का हमारे शरीर में निर्माण नहीं हो पाता है इन्हें लेने के लिए भोजन पर निर्भर रहना पड़ता है। अथवा भोजन के द्वारा इन्हें लेना आवश्यक हो जाता है, ऐसे अमीनों एसिड को आवश्यक अमीनों एसिड कहा जाता है। इनकी संख्या नौ होती है।
(क) आवश्यक अमीनों एसिड
(1) Histidine (हिस्टीडीन)
(2) Iso-Leucine (आइसो-ल्यूसीन)
(3) Leucine (ल्यूसीन)
(4) Lysine (लायसिन)
(5) Methionine (मिथियोनिन)
(6) Phenylalanine (फिनाइललेनिन)
(7) Threoninon (थ्रियोनिन)
(8) Tryptophan (ट्रिप्टोफेन)
(9) Valine (वेलीन)
(ख) आंशिक रूप से आवश्यक अमीनों एसिड-
(1) Tyrosine (टायरोसिन)
(2) Cystine (सिसटीन)
(3) Serine (सीरीन)
(4) Glycine (ग्लायसीन)
(5) Arginine (आर्जीनिन)
प्राप्ति के साधन
प्रोटीन जन्तु तथा वनस्पति दोनों साधनों से प्राप्त होता है। वनस्पति भूमि से नाइट्रोजन, जल, हवा आदि लेकर प्रोटीन का निर्माण करते हैं तथा अपने बीजों में संग्रह करते हैं। जन्तु इस वनस्पति प्रोटीन का उपयोग कर अपने शरीर के अनुरूप बना लेता है। मनुष्य जन्तु एवं वनस्पति दोनों माध्यम से प्रोटीन का उपयोग करता है। जन्तु प्रोटीन हमारे शरीर के प्रोटीन के अधिक समान होती है। अतः जन्तु प्रोटीन अधिक उपयोगी होती है। जैसे- मांस, मछली, अण्डा, दूध एवं दूध से बने पदार्थ। कुछ वनस्पति प्रोटीन भी हमारे शरीर के लिए बहुत उपयोगी होते है, जैसे-सोयाबीन, अनाज, दालें, मेवें, मूंगफली आदि
शरीर में उपयोगी
प्रोटीन आहार में अत्यंत आवश्यक अंश है। यह जंतु शरीर को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। शरीर की मांसपेशियाँ, अन्य ऊत्तकै कोष्ठांग, एन्जाइम्स तथा अधिकांश हारमोन्स प्रोटीन के बने होते हैं। प्रोटीन के नाइट्रोजन तत्व से शरीर की कोशिकाओं के प्रोटोप्लाज्म, ऊत्तक तथा कोष्ठांगों की रचना होती है। शरीर में वसा तथा कार्बोज के समान प्रोटीन का संचय नहीं होता है। अतः जो कुछ प्रोटीन हम लेते हैं, प्रतिदिन उसका उपयोग शरीर के उपचयार्थ होता रहता है और बचा हुआ प्रोटीन शक्ति उत्पादनार्थ जल जाता है। प्रोटीन के चयापचय से उत्पन्न अनुपयोगी पदार्थ गुर्दों से होकर मूत्रपथ से बाहर
आता रहता है। ऊतक वृद्धि के अतिरिक्त प्रोटीन के प्रतिग्राम में 4.1 कैलोरी उर्जा देने की क्षमता होती है। शरीर की टूटी-फूटी कोशिकाओं, अंगों आदि की मरम्मत प्रोटीन से होती है। शरीर की वृद्धि के लिए यह अति आवश्यक है।
आवश्यक मात्रा- एक साधारण युवक के लिए आहार में प्रतिदिन उसके शरीर भार के प्रति किलोग्राम पर एक ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है।
(2) कार्बोहाइड्रेट
आहार में उर्जा का अधिकतर भाग कार्बोहाइट्रेट से ही लिया जाता है। यह शरीर में उत्पन्न होने वाली अधिकांश शक्ति का स्रोत है। कार्बोहाइड्रेट कार्बन, हाइड्रोजन, व ऑक्सीजन द्वारा निर्मित एक यौगिक है जिसमें हाईड्रोजन व ऑक्सीजन का अनुपान 2:1 पाया जाता है।
स्रोत-
प्रायः सभी भोज्य पदार्थ कार्बोहाइड्रेट युक्त होते है। कार्बोहाइड्रेट की प्राप्ति का साधन बताने के लिए कार्बोहाइड्रेट को दो रूपों में विभाजित कर सकते है।
1. मीठे कार्बोहाइड्रेट (शर्करा) शक्कर, गुड़, शहद, किशमिश, मीठे फल आदि।
2. फीके कार्बोहाइड्रेट (स्टार्च) दालें, गेंहूँ, मैदा, साबूदाना, आलू आदि
दुग्ध शर्करा (Milk Sugar) तथा मांस में ग्लाइकोजेन की थोड़ी मात्रा छोड़कर जितना भी कार्बोहाइड्रेट हम लोग आहार के माध्यम से लेते हैं वह पौधों से प्राप्त होता है। शर्करा हमें फल, गन्ना, चुकंदर, मधु आदि से मिलता है। पॉलीसैकेराइड्स स्टार्च, अन्न, दाल तथा Root Vegetables में पाया जाता है। सेलुलोज जो कि एक पॉलीसैकेराइड है सब्जियों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, परंतु उसका पाचन मनुष्य द्वारा नहीं होता, वह मल के द्वारा बाहर निकल जाता है।
शरीर में उपयोग-
अवशोषित मोनोसैकेराइड्स को यकृत ग्लूकोज में बदल देता है। ग्लूकोज कोशिकीय ईंधन के रूप में काम करता है। इसकी कुछ मात्रा न्यूक्लिक अम्ल के संश्लेषण में प्रयुक्त होती है। कार्बोज आहार का सबसे बड़ा अंश है और शरीर में उत्पन्न होने वाली अधिकांश शक्ति का स्त्रोत है। आहार रूप में लिया गया प्रत्येक प्रकार का कार्बोज अंततः ग्लूकोज तथा फ्रक्टोस में परिवर्तित तथा शोषित होकर पोषक रस बनता है। शक्ति स्त्रोत के रूप में प्रति एक ग्राम शर्करा से 4.0 कैलोरी शक्ति प्राप्त होती है। रासायनिक दृष्टि से कार्बोज में कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन तत्व पाए जाते हैं। क्रियाशील मांसपेशियों में ग्लूकोज के जलने से शक्ति प्राप्त होती है। ग्लूकोज का जो अंश तुरंत उपयोग में नहीं आता वह ग्लाइकोजन में परिवर्तित होकर यकृत तथा मांसपेशियों में संचित हो जाता है अथवा वसा में परिवर्तित होकर त्वचा के नीचे जमा होता जाता है।
आवश्यक मात्रा
वयस्कों को कम से कम 100 ग्राम कार्बोहाइड्रेट प्रतिदिन अवश्य लेना चाहिए।
(3) वसा
(क) स्रोत- हम लोग सेचुरेटेड वसा जंतु उत्पाद से लेते हैं जैसे मांस, दूध, घी, मक्खन आदि तथा कुछ पादप उत्पाद जैसे नारियल से अनसेचुरेटेड वसा। ये स्वास्थ्य के लिए आवश्यक माने जाते हैं। ये बादाम,
सरसों, तिल तथा वनस्पति तेल में पाए जाते हैं। वसा से मिलती-जुलती रचना वाले पदार्थ ऐस्टेरॉल्स वसा कोलेस्ट्राल होते हैं, जो मनुष्य के पित्त, नाड़ी, उत्तक तथा रक्तकणों में उपस्थित रहते हैं।
(ख) शरीर मे उपयोग शरीर में उपयोग वसा में भी कार्बोज के ही समान कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन तत्व होते हैं, अंतर मात्र इतना होता है कि इनका अनुपान भिन्न होता है। वसा में कार्बोज की अपेक्षा ऑक्सीजन का अनुपान कम होता है।
कार्बोज के समान ही वसा भी शरीर में शक्ति का प्रमुख स्रोत है। प्रति एक ग्राम वसा में 9.0 कैलोरी शक्ति प्राप्त होती है, जो अनुपान में कार्बोज की शक्ति प्रदायकता के दुगने से अधिक है। जल में घुलनशील न होने से वसा का शोषण इमल्सन के रूप में होता है। इस दृष्टि से आहार में इस प्रकार की वसा अच्छी मानी जाती है, जो द्रव रूप में हो या शरीर तापक्रम पर द्रवित हो जाए। इसके विपरीत अधिक ठोस वसा शरीर के लिए उतनी उपयोगी नहीं है। वैसे भी वसा का पाचन एवं शोषण मंद गति से होता है। आवश्यकता से अकि लिया गया वसा या तो अवशोषित हो पुरीष के साथ बाहर आ जाता है या शोषित होकर त्वचा के नीचे या शरीर में अन्य स्थानों में संचित होता जाता है और शरीर की क्रियाओं के लिए हानिकारक सिद्ध होता है।
(ग) आवश्यक मात्रा वसा अपने आहार के 30 प्रतिशत से ज्यादा नहीं लेना चाहिए। कोलेस्टेरॉल 250 मिलीग्राम से ज्यादा नहीं लेना चाहिए।
वसा में भी कार्बोहाइट्रेट के ही समान कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन तत्व होते है अन्तर मात्र इतना होता है कि इसका अनुपान भिन्न होता है वसा में कार्बोहाइट्रेट की अपेक्षा ऑक्सीजन का अनुपान कम होता है।
4- विटामिन
विटामिन दो प्रकार के होते हैं: 1) वसा में घुलनशील, 2) जल में घुलनशील। विटामिन्स अत्यंत जटिल कार्बनिक पदार्थ हैं जिनका आहार के माध्यम से प्राप्त होना आवश्यक है। ये शरीर की रोगों से रक्षा करते हैं। इनकी अनुपस्थिति में नानाविध अपोषण जन्य रोग उत्पन्न होते हैं। इनका शरीर में संचय नहीं होता है। अतः इसे निश्चित मात्रा में प्रतिदिन अवश्य लेना चाहिए।
1. वसा में घुलनशील विटामिन ये निम्नलिखित हैं :-
(क), विटामिन 'ए'- यह संपूर्ण शरीर के एपिथीलियम ऊत्तक को स्वस्थ रखने, नई कोशिकाओं की वृद्धि तथा स्वस्थ दृष्टि के लिए आवश्यक है। यह वृद्धि कर (Growth Promotive) तथा विषाणुहर (Anti Infective) विटामिन माना जाता है। विटामिन 'ए' मुख्य रूप से दूध, मक्खन, घी, मछली, वसा, मांस, अंडे तथा अन्य जन्तु वसा में पाया जाता है। हरी सब्जी जैसे गाजर, गोभी, पपीता, मूली तथा फल आदि में यह अच्छी मात्रा में पाया जाता है। इसकी कमी से मुख्यतः रतौंधी (Night Blindness) नामक बीमारी होती है।
(ख). विटामिन 'डी'- यह अस्थियों एवं दाँतों के कैल्सीफिकेशन (Calcification) के लिए तथा रिकेट्स व अस्थिमलेसिया रोग के प्रतिरोध के लिए आवश्यक है। यह अंडा, मक्खन, वसा, घी आदि में पाया जाता है। मानव त्वचा में सूर्य की अल्ट्रावॉयलेट किरणों के संपर्क से विटामिन 'डी' का स्वतः निर्माण होता है। मनुष्य को प्रतिदिन 400-1000 I.U. (International Unit) विटामिन 'डी' की आवश्यकता होती है। इसे अंग्रेजी में केल्सिफेरॉल कहते हैं।
(ग). विटामिन 'ई'- इसे ऐन्टीस्टेरिलिटी विटामिन भी कहते हैं। यह प्रजनन प्रक्रिया को बढ़ाता है। यह गेहूँ, जमते हुए दानों, हरी सब्जियों और कुछ वनस्पति तेलों में पाया जाता है। इसकी कमी से बन्धता उत्पन्न होती है। इसे अंग्रेजी में Tochoferol कहा जाता है।
(घ). विटामिन 'के'- इसे 'कोएगुलेशन विटामिन' भी कहा जाता है। सामान्य रक्त के जमने की प्रक्रिया में इसका कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह हरी पत्तियों, गोभी, गाजर, सोयाबीन आदि में पाया जाता है। यह प्रोथ्रोंबिन निर्माण में सहायक होता है। इसकी कमी से रक्तपित्त रोग होता है।
2. जल में घुलनशील विटामिन
घुलित विटामिन विटामिन 'बी' कॉम्प्लेक्स एवं विटामिन 'सी' जल घुलित विटामिन्स हैं। 'बी' समूह (B-Complex) के प्रमुख विटामिन निम्नलिखित हैं
(i) Vitamin B1 (Thiamine) यह अंकुरित गेहूँ, यीस्ट, अनाज के छिलके, अनाज, दाल, मांस, मटर, दुग्ध, अंडा, केला, सेव आदि में पाया जाता है।
उपयोग - तंत्रिका तंत्र के सामान्य कार्य करने में तथा कार्बोहाइड्रेट की मात्रा का नियंत्रण करने में थाइमिन विशेष भूमिका निभाता है। यह हृदय की मांसपेशी की रक्षा करता है, मस्तिष्क के कार्य को उद्दीप्त करता है तथा कब्ज को रोकता है।
(ii) Vitamin B2 (Riboflavin) यह हरी पत्तीदार सब्जियों, दूध, पनीर, अंकुरित गेहूँ आदि में पाया जाता है।
उपयोग- Vitamin B2 शरीर की सामान्य वृद्धि के लिए आवश्यक है। नेत्र, त्वचा, नाखून तथा बालों को स्वस्थ रखने के लिए यह आवश्यक है।
(iii) Vitamin B3 (Niacin) यह गेहूँ, हरी पत्तीदार सब्जियों, खजूर, मछली, अंडे आदि में पाया जाता है।
उपयोग - Vitamin B3, रक्त के सामान्य परिसंचरण, तंत्रिका तंत्र को ठीक से कार्य करने के लिए तथा कार्बोज एवं प्रोटीन को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक है। यह लिंग हारमोन, कार्टीसाल, थाइरॉक्सिन तथा इन्सुलिन के संश्लेषण के लिए आवश्यक है।
(vi) Vitamin B5 (Pantothenic Acid) यह सभी अनाज, हरी सब्जियों, मटर, मांस, अंडे आदि में पाया जाता है।
उपयोग- यह कोशिका के निर्माण, शरीर की सामान्य वृद्धि तथा केंद्रिय तंत्रिका तंत्र के विकास में मदद करता है। यह अधिवृक्क ग्रंथि को उद्दीप्त करता है तथा इससे कॉर्टिसोल एवं दूसरे हारमोन्स का स्राव बढ़ जाता है। यह वसा तथा शर्करा का उर्जा में रूपांतरण भी करता है।
(iv) Vitamin B6 (Pyridoxine) यह यीस्ट, गेहूँ, अनाज, दाल, केला, वालनट, सोयाबीन, दूध, अंडा, यकृत, ताजा सब्जी आदि में पाया जाता है।
उपयोग- यह वसा तथा प्रोटीन के अवशोषण में मदद करता है। यह स्नायु की रक्षा करता है। त्वचा
संबंधी बीमारियों को दूर करता है। यह degenerated disease से हमारी रक्षा करता है।
(v) Vitamin B9 (Folic Acid) यह हरी पत्तीदार सब्जियों, मांस, मटर, Liver Meat आदि में पाया जाता है।
उपयोग- Vitamin B9 शरीर की सामान्य वृद्धि तथा कोशिकाओं के विभाजन के लिए उत्तरदायी है। यह प्रोटीन के संश्लेषण को नियंत्रित करता है। यह अविकसित अन्न की रक्षा करता है।
(vii) Vitamin B12 (Cyanocobalamin) यह केला, मटर, अंडा, मांस, दूध आदि में पाया जाता है।
उपयोग- यह केंद्रिय तंत्रिका तंत्र के कार्य को नियंत्रित करता है। यह लाल रक्त कण के निर्माण को नियंत्रित करता है। यह स्मरण शक्ति तथा संतुलन को ठीक करने के लिए वसा, कार्बोज तथा प्रोटीन का सही उपयोग करता है।
(viii) Vitamin C (Ascorbic Acid)- यह खट्टे फल, हरी पत्तीदार सब्जियों, आँवला, हरा चना आदि में पाया जाता है।
उपयोग- यह शरीर की सामान्य वृद्धि तथा ऊत्तकों के निर्माण के लिए आवश्यक होता है। संधियों, हड्डियों, दाँत तथा मसूड़े आदि को स्वस्थ रखने के लिए Vitamin C आवश्यक है। यह पुनर्निर्माण प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। यह हर प्रकार के तनाव तथा विषाक्त रसायन से हमारी रक्षा करता है। यह Common Cold से हमारी रक्षा करता है। यह Blood Cholesterol को भी कम करता है।
5. खनिज लवण
क ). संघटन - शरीर के भार का 20वाँ हिस्सा खनिज पदार्थों से बना होता है। खनिज पदार्थ मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं -
(i) अम्लात्मक (Acid Forming) जैसे फास्फोरस, सल्फर, क्लोरीन।
(ii) क्षारात्मक (Alkali Forming) जैसे कैल्सियम, पोटैशियम, सोडियम, लौह तथा मैग्रीशियम। (Ca, H, Na, Fe, mg.)
ख ). स्रोत - हरी सब्जी, शाक, फल, दूध, अंडा, मक्खन, घी आदि।
ग ). शरीर में उपयोग - खनिज पदार्थ शरीर के निर्माण तथा वृद्धि के लिए आवश्यक हैं। ये शरीर के द्रव्यांश में आवश्यक परासरण दबाव बनाए रखने तथा शरीर के अम्ल-क्षार संतुलन (Acid Base Balance) को बनाए रखने का महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं। मूत्र तथा स्वेद से बराबर निकलते रहने वाले खनिजों की पूर्ति हेतु भी इनकी आवश्यकता होती है। आहारीय खनिज लवणों द्वारा शरीर में निम्नलिखित कार्य संपन्न होते हैं
(i) माँसपेशियों, नाड़ियों (Veins) तथा रक्त का समुचित तन्यता (Tonacity) बनाए रखने में।
(ii) पाचक रसों के स्राव को प्रेरित करना।
(iii) शरीर की सामान्य वृद्धि में सहायता।
(vi) शरीर में अम्ल-क्षार संतुलन बनाए रखना।
(v) शरीर कठोर संरचना (अस्थि पंजर, दंत) आदि को बनाए रखना।
शरीर में लगभग पंद्रह प्रकार के विभिन्न खनिज तत्व होते हैं, जो उपरोक्त सामान्य कार्यों के अतिरिक्त अनेक विशिष्ट कार्य संपन्न करते हैं।
6. जल
क. संघटन - शरीर भार का लगभग 65% भाग जल ही होता है। जल हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के मिलने से बनता है। इसका रासायनिक सूत्र H2O होता है।
ख. स्रोत - आहार में लिए जाने वाले कई पदार्थों जैसे दूध, फल आदि का अधिकांश भाग जलीय होता है परंतु जल की पूर्ण आवश्यकता पूर्ति के लिए अलग से जल पीना आवश्यक होता है।
ग. शरीर में उपयोग जल आहार का अत्यंत महत्वपूर्ण अंश है। बिना जल के मनुष्य का कुछ दिनों से अधिक जीवित रहना संभव नहीं है। शरीर में जल के निम्नांकित उपयोग होते हैं
(i) प्रतिदिन मल, मूत्र, स्वेद, श्वास के माध्यम से होने वाले जल के ह्रास की आपूर्ति तथा शरीरगत जल के अंश के नवीनीकरण हेतु जल की आवश्यकता बनी रहती है।
(ii) पोषक तत्वों के संवहन में भी जल ही माध्यम है।
(iii) जल के बिना आहार का पाचन तथा रस संवहन संभव नहीं है।
(vi) शरीर से अनेक विसर्जनीय पदार्थों के निष्क्रमण के लिए भी जल आवश्यक है।
घ. आवश्यक मात्रा - सामान्यतः प्रतिदिन लगभग दो से ढाई लीटर जल लिया जाना चाहिए।
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