महर्षि Patanjali का तीसरा सूत्र:
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥ (योगसूत्र 1.3)
शब्दार्थ:
तदा = तब
द्रष्टुः = देखने वाला (आत्मा/साक्षी)
स्वरूपे = अपने वास्तविक स्वरूप में
अवस्थानम् = स्थित होना
सरल अर्थ:
तब साधक अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाता है।
विस्तृत व्याख्या:
जब मन की सारी चंचल वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं (जैसा दूसरे सूत्र में बताया गया), तब मनुष्य अपने असली स्वरूप को पहचानता है।
हम सामान्यतः अपने शरीर, मन, भावनाओं और विचारों को ही “मैं” मान लेते हैं, लेकिन पतंजलि कहते हैं कि हमारा वास्तविक स्वरूप आत्मा है।
जब मन शांत होता है, तब आत्मा का प्रकाश स्पष्ट दिखाई देता है।
उदाहरण:
जैसे गंदे पानी में अपना चेहरा साफ नहीं दिखता,
लेकिन पानी शांत और स्वच्छ होने पर चेहरा स्पष्ट दिखता है।
उसी तरह शांत मन में आत्मा का सच्चा स्वरूप प्रकट होता है।
व्यावहारिक संदेश:
ध्यान और प्राणायाम से मन स्थिर होता है।
मन शांत होने पर आत्मज्ञान संभव होता है।
योग का उद्देश्य केवल शरीर को स्वस्थ रखना नहीं, बल्कि आत्मा को जानना है।
सार:
जब चित्त शांत होता है, तब साधक अपने असली अस्तित्व को अनुभव करता है।
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