Why does disease occur ? stay healthy-be strong ? स्वस्थ रहें-मजबूत बनें , रोग क्यों होता है ?


स्वस्थ रहें-मजबूत बनें


'स्वस्थ' शब्द का अर्थ है-स्व में स्थित। जो व्यक्ति अपने में स्थित, आत्मा में स्थित होगा, तो वह आत्मा के शांति, प्रेम, आत्मीयता, प्रसन्नता, संतोष, कर्त्तव्यपालन, आदि गुणों से युक्त होगा, सही आहार-विहार का पालन करेगा और निरोगी रहेगा। मोटे तौर पर दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि जो बिना किसी कष्ट के अपनी सब क्रियाओं का संपादन कर ले, वह स्वस्थ व्यक्ति हैं। इन क्रियाओं में सबसे पहले उन क्रियाओं का स्थान है, जो शरीर के निर्वाह के लिए आवश्यक है। जैसे भूख, पाचन एवं मल निष्कासन।

रोग क्यों होता है?


प्रकृति ने हमारे शरीर के विजातीय द्रव्य बाहर निकालने के लिए चार मार्ग दिए हैं। फेफड़े प्राणवायु ऑक्सीजन ग्रहण करते तथा कार्बनडाइऑक्साइड के रूप में विजातीय तत्त्व बाहर निकालते हैं। त्वचा पसीना के रूप में, गुर्दे मूत्र के रूप में तथा बड़ी आँत मल के रूप में विजातीय तत्त्व बाहर निकालने का कार्य करते हैं।

हमारी गलत आदतों के कारण आहार-विहार एवं आचार- विचार में विकृति आने पर जब प्रकृति प्रदत्त ये चार मार्ग कार्य नहीं कर पाते, तब प्रकृति पाँचवाँ मार्ग सुनिश्चित करती है। वह पाँचवाँ मार्ग प्रकृति का असाधारण उपाय है। वह बुखार, उलटी, दस्त, फोड़ा-फुंसी या सरदी-जुकाम-खाँसी के रूप में हो सकता है। प्रकृति शरीर की रक्षा के लिए पाँचवाँ मार्ग चुनकर शरीर को निरोग रखना चाहती है। जब हम दवा द्वारा इन रोगों को दबाने का प्रयास करते हैं तो प्रकृति की सफाई प्रक्रिया में हम बाधक बन जाते हैं। विजातीय द्रव्य बाहर नहीं निकल पाता फलतः जीर्ण रोग पैदा होजाता है, जिसका नाम दमा, कोलायटिस, संधिवात, गठिया, बवासीर, एक्जिमा आदि हो सकता है।

प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान ने गहराई से प्रकृति की आवाज को समझकर सरदी-जुकाम, बुखार, दस्त, फोड़ा-फुंसी आदि तीव्र रोग होने पर दवाएँ लेकर रोग को न दबाने के लिए जन-जन को प्रेरणा दी है। ऐसे अवसर पर रोगी को ठोस आहार न दें। मौसमी, संतरा, अनार, नींबू का रस पानी में निचोड़कर दो चम्मच शहद मिलाकर बार-बार पिलाते रहें। एक या दो दिन में ही रोग की तीव्रता कम होगी। शरीर को स्वच्छ स्फूर्तिमय बनाकर तीव्र रोग चला जाएगा। सही आहार-विहार का ध्यान रखना स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है।

किसी ईमानदार चिकित्सक ने कहा है-

दवा दबाए रोग को, क्यों करते हो भूल। 
चतुर चिकित्सक ठग रहे, करो न ऐसी भूल ॥

हमारे शरीर में रोगों से लड़ने की शक्ति को रोग प्रतिरोधक क्षमता (जीवनी शक्ति) कहते हैं। जब भी यह शक्ति हमारे गलत तौर-तरीकों से कम होती है या नष्ट होती है तो शरीर रोगग्रस्त हो जाता है। जब तक यह शक्ति यथेष्ट मात्रा में रहती है, तब तक शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जीवनी शक्ति ही प्रयास करती है। विजातीय द्रव्य (तत्त्व) को बाहर निकालने का कार्य जीवनी शक्ति पर निर्भर करता है।

स्वस्थ रहने के लिए क्या करें?


गीता में लिखा है-

युक्ताहारविहारस्य, युक्तचेष्टस्य कर्मसु। 

युक्तस्वप्नावबोधस्य, योगो भवति दुःखहा ॥


अर्थात उचित आहार-विहार (रहन-सहन), उचित कर्म व्यवहार तथा सही समय पर सोना और प्रातः जल्दी उठना, यह योग दुःख दूर करने वाला है। गीताकार ने एक ही श्लोक में समग्रस्वास्थ्य रक्षा का सूत्र एवं जीवन जीने की कला का शिक्षण दिया है।

प्रातःकाल क्या करें?


(१) सूर्योदय के एक-डेढ़ घंटे पूर्व जग जाएँ तथा उठते समय दोनों हथेलियों के दर्शन करते हुए ईश्वर से जीवन के लिए कृतज्ञता प्रकट करें। फिर धरती माँ को प्रणाम करें। अब दो गिलास पानी पीएँ। ठंढ के दिनों में गरम पानी पीएँ। यदि अम्ल-पित्त की शिकायत न हो तो पानी में आधा नींबू निचोड़कर पानी पी लें। पानी में दो चम्मच शहद मिलाकर भी ले सकते हैं।

(२) शौच से निवृत्त होने के बाद दांतुन या बुश से दाँत साफ करें। दांतुन को प्राथमिकता दें।

(३) इसके पश्चात खुले मैदान में घूमने निकल जाएँ। तेज चाल से चलते हुए, गहरी साँस लेते हुए लगभग चार-पाँच किलोमीटर तेज चाल से टहलें या यथाशक्ति दौड़ें।

(४) टहलकर आने के पश्चात तीस मिनट योगासन, प्राणायाम, ध्यान करें।

(५) दस मिनट शिथिलीकरण के बाद ठंढे पानी से शरीर को रगड़-रगड़कर स्नान करें।

(६) स्नान के बाद थोड़ा समय प्रार्थना, ईश्वरोपासना, जप, ध्यानादि के लिए सुनिश्चित करें।

(७) अच्छी पुस्तकों का जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण पैदा करने में बड़ा महत्त्व है। शांति, संतोष, प्रसन्नता, सद्भावना, सत्साहस पैदा करने वाले विचारों से युक्त साहित्य नियमित पढ़ें।

भोजन और स्वास्थ्य :


वर्तमान समय में सबसे समझदार माने जाने वाला मनुष्य अपने स्वास्थ्य के मामले में मूर्खतापूर्ण आहार ले रहा है। यह सबसे बड़े अचम्भे की बात मानना चाहिए कि बड़े-बड़े आविष्कार वाले युग में समझदारों में नासमझी कैसे पनपी ?
देर रात तक जागना, चाय, मैदा, चीनी, टॉफी, बिस्कुट, ब्रेड, पिज्जा, बरगड़, चाऊमीन, डिब्बा बंद, पैकेट बंद खाद्य पदार्थों का प्रचलन, बोतलबंद ठंढे पेय पदार्थों को सभ्यता मानना कहाँ की समझदारी है? कैंसर जैसे खतरनाक रोगों तथा एलर्जी, दमा, उच्च रक्तचाप, अनिद्रा, माइग्रेन, हृदयरोग, डायबिटीज, बवासीर आदि रोगों को जन्म देने वाले इन खाद्यों का बाल्यावस्था से ही सेवन करने की बुरी लत पैदा हो रही है। यही आदत आज सभ्य लोगों की पहचान बनने से जो भी सभ्य कहलाना चाहता है, यही भोजन अपनाता है। होता यह है कि जो भी डिब्बा बंद खाद्य हैं, उनके संरक्षण (प्रिजर्वेशन) के लिए उनमें कीटनाशकों (घातक रसायनों) का प्रयोग किया जाता है। कृत्रिम रंगों, कृत्रिम गंध तथा कृत्रिम स्वाद के लिए तरह-तरह के रसायनों का प्रयोग कर मानव जाति के लिए एक बड़ा स्वास्थ्य संकट पैदा कर दिया है।

जब जागे तब सबेरा :


युवको ! उठो !! जागो !!! आप उज्ज्वल भविष्य के रचनाकार हैं। आप स्वस्थ रहेंगे तो राष्ट्र सबल रहेगा। मिर्च-मसालेदार खाद्य, अचार, शर्बत, रंग-बिरंगी मिठाईयाँ, चाय, चीनी, मैदा, वनस्पति घी, तथा तले खाद्यों को छोड़कर प्रकृति की शरण में लौटिए। प्रकृति की आवाज सुनिए, आपको चिर स्वास्थ्य मिलेगा। प्रकृति ने पेड़ों पर मिठाइयाँ लगाई हैं। खजूर, अमरूद, अनार, नाशपाती, आम आदि के प्राकृतिक स्वाद का आनंद लें। इसी में स्वास्थ्य है। कृत्रिम बनावटी पदार्थों में रोग लिपटा हुआ है। रंग-बिरंगे पैकेटों द्वारा बच्चों का, युवकों का स्वास्थ्य एवं जीवनी शक्ति (रोगों से लड़ने की शक्ति) का ह्रास हो रहा है। अंकुरित गेहूँ, मूँग, चना, मूँगफली में सारे जीवन तत्त्व हैं। आप नियमित पच्चीस-पचास ग्राम प्रातःकाल सेवन करें। नाश्ते को स्वास्थ्यनाशक न बनाकर रोगनाशक बनाएँ। नाश्ते मेंअंकुरित अन्न, संभव हो तो ताजा शुद्ध गाय का दूध तथा ढाई सौ ग्राम फल (जो आपको अपने आसपास सरलता से उपल्लाम हों) लेते रहें।

भोजन क्या और कैसे?


(१) जीने के लिए भोजन करें न कि भोजन के लिए जिएँ।

(२) बिना कड़ी भूख लगे कुछ भी न खाएँ।

(३) सबेरे के नाश्ते में दूध, अंकुरित अनाज तथा फल लें।

(४) दोपहर एवं रात्रि के भोजन में रोटी, छिलके वाली दाल, सब्जी एवं सलाद लें।

(५) रोटी चोकर युक्त आटे की हों। सब्जी में मिर्च-मसालों का प्रयोग न हो। बारीक आटा आँतों से चिपककर कब्ज पैदा करेगा, जो सब रोगों को जन्म देने वाला है।

(६) भोजन खूब चबा-चबाकर धीरे-धीरे करें। ठीक तरह से चबाकर भोजन करने से लार भोजन में मिलती है, जिससे भोजन में स्थित कार्बोज का पाचन ठीक ढंग से होता है। कहावत भी है-बत्तीस दाँत हैं तो बत्तीस बार चबाएँ। यह भी कहते हैं कि भोजन को पिएँ, पानी को खाएँ। तात्पर्य यही है कि ठोस भोजन को इतना चबाएँ कि पानी की तरह पतला हो जाए, तभी निगलें। पानी यूँ ही गटागट न पीएँ। पानी को धीरे-धीरे एक- एक घूँट पीएँ। भोजन को अच्छी तरह चबाने से पाचक रसों का उचित मात्रा में स्राव होता है तथा आँतों की सर्पिल गति भी संतुलित रहती है, जिससे कब्ज या पतले दस्त नहीं होंगे। खूब चबा-चबाकर खाने से मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस केंद्र में स्थित भूख का केंद्र कम भोजन से ही तृप्त हो जाता है। मस्तिष्क के तृप्तिदायक (संतुष्टि प्रदान करने वाला) हार्मोन सेरेटोनिन का स्राव बढ़ जाता है, जिससे दिन भर दूँसते रहने की, पेटूपन की बुरी आदतों पर नियंत्रण होता है। अग्न्याशय (पेंक्रियास) की बीटा कोशिकाएँ सक्रिय होकर इंसुलिन का स्त्राव बढ़ जाता है,
जिससे झूठी भूख का नियंत्रण होता है। भूख खुलकर लगती है तथा डायबिटीज रोग पैदा नहीं होता है।

(७) जापान की एक यूनिवर्सिटी के कैंसर विशेषज्ञों ने बताया है कि खूब चबा-चबाकर खाने से लार में स्थित टायलिने (सलाइवा एमाइलेज) एन्जाइम में एंटीकार्सिनोजेबिक फैक्टर पाया जाता है, जो भोजन में मिलता है, जो कैंसर रोधी फैक्टर है।

(८) भोजन के बीच में पानी न पीएँ। भोजन करने के आधा घंटे पूर्व से भोजन के डेढ़ घंटे बाद तक पानी न पीएँ। शेष समय में पानी पर्याप्त मात्रा में घूँट-घूँटकर धीरे-धीरे पीएँ।

(९) भोजन के बाद दूध न पीएँ। भोजन करने या दूध पीने और सोने के बीच दो घंटे का अंतराल रखें।

(१०) भोजन के तत्काल बाद १० मिनट वज्रासन में बैठना लाभकर है।

(११) भोजन के तत्काल बाद न सोएँ। तुरंत सोने से पाचन क्रिया बाधित होती है तथा नींद पूरी होने पर भी ताजगी नहीं आती है।

(१२) दिन भर में कम-से-कम ढाई-तीन लीटर पानी पीएँ।

(१३) पॉलिश किया हुआ चावल न खाएँ। दाल छिलका समेत खाएँ। हरी सब्जियाँ, सलाद एवं फल का सेवन अन्न से तिगुनी मात्रा में करें।

(१४) जिस मौसम में जो फल मिले, उसका भरपूर सेवन करें। सड़े-गले या कच्चे फलों का सेवन न करें। पके फल का सेवन करें।

(१५) मन क्रोध, चिंता, तनाव, शोक आदि तीव्र उद्वेग से ग्रसित हो, तो उस वक्त भोजन न करें।

(१६) हमारे भोजन में कचौड़ी, पूड़ी, पकौड़ी, समोसा, अचार आदि न हों। टमाटर, पालक, नारियल, आँवला आदि की ताजी चटनी ले सकते हैं।
(१७) गरिष्ठ, बासे, तले खाद्यों से बचे रहेंगे तो पाचन शक्ति दुरुस्त रहेगी।

(१८) सप्ताह में एक दिन का उपवास करें, जिसमें केवल नींबू अथवा नींबू-शहद का सेवन पानी के साथ करें।

(१९) स्वस्थ चित्त, प्रसन्न मन से किया गया भोजन आसानी से पचता है।

(२०) भोजन के साथ सलाद लेने से आवश्यक खनिज लवण (मिनरल्स) मिल जाते हैं। अतः गाजर, मूली, हरा धनिया, पके टमाटर, पत्ता गोभी, ककड़ी, खीरा आदि सलाद के रूप में लेना चाहिए।

क्या-क्या न करें?


(१) रात्रि में जागरण न करें।

(२) मुँह ढककर न सोएँ।

(३) रात को सोते समय खिड़कियाँ बंद न करें।

(४) तंग पोशाक न पहनें।

(५) ऊँची ऐड़ी के चप्पल-जूते न पहनें।

(६) कृत्रिम वस्त्र को प्रधानता न दें। यथाशक्ति सूती वस्त्र पहनें।

(७) छींक, पेशाब, जम्हाई एवं पाखाना का वेग न रोकें।

(८) टी.वी. नजदीक से न देखें।

(९) लेटे हुए न पढ़ें।

(१०) चाय, काफी, फास्ट फूट, चाकलेट, आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक्स न लें।

(११) बीड़ी, सिगरेट, पान-मसाला, जर्दा, तम्बाकू आदि नशों का सेवन न करें।

(१२) मांस-मछली, अंडे, शराब का सेवन न करें।

(१३) साबुन, शैम्पू, नेल पॉलिश, लिपस्टिक जैसे हानिकर सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग न करें।

हितकारी भोजन क्या है?


जिस भोजन में क्षार का अंश अधिक होगा एवं अम्ल का अंश कम होगा वही हितकारी भोजन है। हमारे खून में ८०% क्षार एवं २०% अम्ल शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है। जो व्यक्ति क्षार उत्पन्न करने वाले खाद्य कम खाते हैं और अम्लीय खाद्य अधिक खाते हैं, वे रोगों को निमंत्रण देते हैं।

क्षार तत्त्व कैसे प्राप्त करें?


शाक-भाजियों के छिलकों और अनाज के चोकर में क्षार की मात्रा अधिक होती है। हमारी सभ्यता ने हमें उलटा ही पाठ पढ़ा दिया है। हम काम की चीजों को फेंक देते हैं और सार हीन पदार्थ ग्रहण करते जाते हैं। हम अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। मोटे पिसे गेहूँ के आटे में (यदि उसे छाना न जाए) क्षार का अंश पर्याप्त मात्रा में रहता है। जब उसे खूब बारीक पीसकर या पिसवाकर मैदा बना लिया जाता है तो उसको खाने से सिर्फ अम्लता पैदा करने वाला अंश ही अंदर जाएगा। इसी प्रकार शाक-भाजियों के छिलके उतारकर फेंकने से अधिकांश क्षार फेंक दिया जाता है। थोड़ा-सा क्षार का अंश दालों के छिलकों में भी होता है। पॉलिश की हुई दालें एवं चावल में अम्ल का अंश अधिक रहता है।

क्षारीय बहुल पदार्थ कौन-कौन से हैं?


(१) सभी मीठे फल।

(२) हरी पत्तीदार शाक-भाजी।

(३) चोकर सहित गेहूँ का आटा।

(४) हाथ के कुटे चावल ।

(५) गुड़ और शहद।

(६) नींबू। स्मरण रखें कि नींबू की खटास में अम्ल का तत्त्व है, परंतु पेट में जाकर वह खटास भी क्षार में बदल जाती है।

अम्लीय खाद्य कौन-कौन से हैं?


(१) मांस-मछली-अंडा।

(२) मैदे से बनी मठरी, समोसा, कचौड़ी, पूड़ी आदि।

(३) मशीन से कुटे सफेद और पॉलिश वाले चावल।

(४) छिलका रहित दालें।

(५) अचार, डिब्बा बंद खाद्य, चाय, काफी, चीनी, कृत्रिम नमक।

(६) मिठाइयाँ।

0 Comments

Post a Comment

Post a Comment (0)

Previous Post Next Post