Definition of diet and diet ( आहार एवं आहार की परिभाषा )

इससे पूर्व खण्ड में आपने स्वास्थ एवं स्वस्थवृत्त के विषय में विस्तार से जाना। आहार, स्वस्थवृत्त का ही एक मुख्य भाग है। बिना आहार के स्वस्थवृत्त का चक्र अपूर्ण है।

इस खण्ड में हम आहार की विस्तार से चर्चा करेंगे। इस इकाई में आप आहार की विभिन्न परिभाषाओं के साथ-साथ आहार की महत्ता को भी जान सकेंगें। मनुष्य की तीन मूलभूत आवश्यकताओं-रोटी, कपड़ा व मकान में से भोजन परम आवश्यक है। भोजन मनुष्य को न केवल जीवित रखने के लिए आवश्यक है बल्कि यह मनुष्य को स्वस्थ रखने के साथ-साथ विभिन्न कार्यों को करने के लिए पौष्टिक आहार की आवश्यकता होती है।

आहार

आहार प्रत्येक प्राणी का जीवन है तथा आहार का सीधा सम्बन्ध उसके शरीरिक एवं मानसिक स्वास्थ से होता है। प्रत्येक भोजन में भिन्न-भिन्न पोषक तत्व उपस्थित होते है तथा प्रत्येक पोषक तत्व शरीर में अलग-अलग रूप से कार्य करता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति कुछ पोषक तत्वों को कम या इसके विपरीत कुछ पोषक तत्वो को अधिक परिमाण में लेने लगे तो भी शरीर के ऊपर उसका विपरीत प्रभाव दिखाई देने लगता है। अतः उपयुक्त पोषक तत्वों को उचित परिमाण भोजन द्वारा ग्रहण करना पूर्ण रूप से स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक है।
संसार का प्रत्येक प्राणी, पेड़-पौधे अथवा निर्जीव वस्तुएँ जैसे इंजन, कार किसी न किसी रूप में भोजन ग्रहण करते है, जिस प्रकार इंजन को चलाने के लिए ईधन तथा कार को चलाने के लिए पेट्रोल की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य को अपने शारीरिक एवं मानसिक कार्य करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। और यह ऊर्जा मनुष्य को आहार से प्राप्त होती है। भोजन के महत्व को एक कहावत द्वारा समझा जा सकता है-

"भूखे भजन न होये गोपाला, धरी रहेगी कंठी माला,"

अर्थात बिना भोजन के आप भगवान का नाम तक नहीं ले सकते । दूसरे शब्दों में हम कह सकते है कि छोटे से छोटा काम करने के लिए हमें भोजन पर निर्भर रहना पड़ता है क्योंकि यही भोजन हमें कार्य करने की ऊर्जा प्रदान करता है।

आज देश तथा विदेश में अनेक संस्थाएँ है जो संसार में भोजन के महत्व को जागरूकता प्रदान कर नये- नये शोध कर निरन्तर कार्य कर रही है-

(i) Food and Agriculture Organisation (FAO)

(ii) World Health Organisation (WHO)

(iii) United Nations International Childrens Emergency Fund (UNICEF)

मानव आहार के दो मुख्य स्रोत है। इसीलिए मानव आहार को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया गया है-


भारतीयों का अधिकतर आहार वनस्पतियुक्त है। जो व्यक्ति शाक-भाजीयुक्त आहार ग्रहण करते है, उन्हें शाकाहारी कहा जाता है। दूध का स्रोत प्राणी है लेकिन इसे शाकाहारी भोजन में सम्मलित किया गया है।

कोई भी पदार्थ जब अन्नमार्ग में ग्रहण किये जाने पर जीवनी शक्ति उत्पन्न करे, धातुओं को पोषण करें, उनकी रक्षा तथा क्षति पूर्ति करे, जीवन की प्रक्रिया को संयमित करे तथा शरीर के महत्वपूर्ण अंशाशो की उत्पत्ति में सहायक हो, उसे आहार कहते है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए देश, काल, समयआदि के आधार पर आहार विधि तथा मात्रा आदि का निर्णय करना चाहिए। चरक संहिता में मानव शरीर एवं व्याधि दोनों को आहार सम्भव माना गया है-

" आहार सम्भवं वस्तु रोगाश्चहारिसम्भवाः । च.सं. (28/45)

उपयुक्त आहार ही शरीर के समुचित विकास तथा सुख एवं स्वास्थ्य का हेतु है। आहार द्वारा शरीर-पोषण की प्रक्रिया अग्नि पर निर्भर है। आहार का पाचन, अवशोषण तथा चयापचय सम्बन्धी सम्पूर्ण क्रिया अग्नि व्यापार के अन्र्तगत आती है।

आहार की परिभाषाएँ -

प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थ रहने के लिए यह आवश्यक है कि वह सन्तुलित आहार लें। आहार क्या है इसको स्पष्ट करने के लिए विभिन्न परिभाषाएं दी जा रही है।

1. "आहार विज्ञान कला एवं विज्ञान का वह समन्वयात्मक रूप है जिसके द्वारा व्यक्ति विशेष या व्यक्तियों के समूह को पोषण तथा व्यवस्था के, सिद्वान्तों के अनुसार विभिन्न आर्थिक तथा शारीरिक स्थितियों के अनुरूप दिया जाता है।

आहार को कला व विज्ञान इसलिए कहा जाता है कि आहार विज्ञान न केवल यह बताता है कि कौन-कौन से पोषक तत्व किस प्रकार लेने चाहिए या उसके क्या परिणाम हो सकते है। बल्कि यह भी बताता है कि उचित स्वास्थ्य के लिए कौन-कौन से पोषक तत्व कितनी मात्रा में लिये जाये। ग

2. आहार को व्यक्ति के भोजन की खुराक भी कहा जाता है अर्थात " व्यक्ति भूख लगने पर एक बार में जितना भोजन ग्रहण करता है, वह भोजन की मात्रा उस व्यक्ति का आहार (DIET) कहलाती है।

3. आहार वह ठोस अथवा तरल पदार्थ है जो जीवित रहने, स्वास्थ को बनाये रखने, सामाजिक एवं पारिवारिक सम्बन्धों की एकता हेतु संवेगात्मक तृप्ति, सुरक्षा, प्रेम आदि हेतु आवश्यक होता है। व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक और सामाजिक क्षमता के संतुलन के लिए आहार अत्यन्त आवश्यक है।

उपनिषदों में कहा गया है कि

आहार शुद्धौ, सत्व शुद्धिः सत्व शुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः ।

अर्थात आहार शुद्ध होनें से अंतःकरण शुद्ध होता है और अंतःकरण शुद्ध होनें पर विवेक बुद्धि ठीक काम करती है।
पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी नें लिखा है कि 'आहार का जीवन की गतिविधियों से गहरा संबंध है। जिस व्यक्ति का जैसा भोजन होगा उसका आचरण भी तनुकूल होगा।'

आदर्श आहार :

आदर्श आहार को निम्न बिन्दुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है-

1. शारीरिक एवं मानसिक पोषण:- कहा गया है 'जैसा खाये अन्न वैसा बने मन' अर्थात आहार ऐसा हो जो मन को भी पोषण प्रदान करे। अतः हम आदर्श आहार में वही भोजन रखें जो हमारे शारीरिक मानसिक स्वास्थ दोनों को ठीक रखे, दोनो का सही विकास करे। शारीरिक दृष्टि से उसमें सभी पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा मे उपस्थित हों और मानसिक दृष्टि से शुद्ध एवं सात्विक हो।

2. प्राकृतिक एवं सप्राण भोजनः- आदर्श आहार का एक गुण प्राकृतिक एवं सप्राण भोजन भी है क्योकि जो प्राण से भरपूर होगा केवल वही हमें प्राण शक्ति प्रदान कर सकता है। अन्न को प्राण भी कहा गया है। आचार्य श्री के अनुसार जीवन्त आहार की प्रमुख विशिष्टता यह है कि शारीरिक परिपुष्टता एवं मानसिक विकास के लिये जिन आवश्यक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है वह इसमें प्रचुरता से विद्यमान रहता है।

3. भोजन साधारण एवं सात्विक हो- आदर्श आहार वही है जो सादा, सात्विक एवं सुपाच्य हो क्योकि सात्विक भोजन ही मानव प्रकृति के अनुकुल है एवं सही रूप से मानसिक एवं शारीरिक एवं आध्यात्मिक विकास करनें में सक्षम है। गीता के 17/8वें श्लोक में कहा गया है कि आयु, बुद्धि, बल और सुख को बढ़ाने वाले सरस, स्निग्ध, रसयुक्त, हृदय ग्राही आहार ही सात्विक है।

"यादृशं भक्षते अन्न बुद्धि भवति तादृशी ।" 

अर्थात जैसा भोजन हम करते है, बुद्धि वैसी ही हो जाती।

डॉ. राकेश जिन्दल के अनुसार बुद्धिमानी इसी मे है कि सादा व सात्विक भोजन ग्रहण किया जाये। 
डॉ. साहू के अनुसार यदि सात्विक भोजन न मिले तो केवल खजूर पर रहें मगर तामसिक भोजन की तरफ आँख उठा कर भी न देखें।

4. शुद्धता एवं पवित्रता - आदर्श आहार वही है जो पौष्टिक, सर्वसुलभ, सात्विक होने के साथ-साथ शुद्ध एवं पवित्र हो। शुद्धता दोनों तरह से आन्तरिक एवं बाह्य होनी चाहिये। बाह्य दृष्टि से आहार साफ सुथरा होना चाहिये पर आदर्श आहार के लिये आन्तरिक शुद्धता अधिक महत्वपूर्ण है। आचार्य श्री ने कहा है कि बाह्य शुद्धता की अपेक्षा आहार की आंतरिक शुद्धता अधिक ध्यान देने योग्य है।

1. आहार जिस स्रोत से ग्रहण किया गया हो वह पापरहित व ईमानदारी से हो। आचार्यश्री ने कहा है कि हमारा आहार जिस साधन या स्रोत से उपलब्ध होता है वही यदि दूषित या पापयुक्त है तो उसका जो बुरा प्रभाव हमारे मन, बुद्धि और आत्मा पर पड़ेगा उससे छुटकारा पाना सहज नहीं है।
आहार की शुद्धता पर जोर देते हुये कहा है कि जो व्यक्ति वास्तव में अपना कल्याण चाहता है और इस मानव जीवन को सफल बनाने की इच्छा रखता है उसे आहार शुद्धि पर अवश्य ध्यान देना चाहिए। अधर्म का अन्न खाना पतनकारी होता है।

5. आध्यात्मिक उन्नति मे सहायक - जो व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन के अभिलाषी हो उनको अवश्य शुद्ध, सादा और पवित्र भोजन ही ग्रहण करना चाहिए।

छन्दोग्योपनिषद् मे कहा गया है -

"आहार शुद्धौ सत्वशुद्धि ध्रुवास्मृतिः । 
स्मृतिर्लब्धे सर्व ग्रन्थीनां विप्र मोक्षः।"

आहार के शुद्ध होनें से अंतःकरण की शुद्धि होती है, अंतःकरण के शुद्ध होने पर बुद्धि निर्मल होने से जब संशय व भ्रम जाते रहते हैं और तब मुक्ति का मिल पाना सुलभ हो जाता है। आचार्य श्री के अनुसार 'मनुष्य का पाचन तंत्र विलक्षण है। वह न केवल आहार से शारीरिक पोषण प्राप्त करता है वरन् उसमे सन्निहित सूक्ष्म शक्ति एवं संवेदना को भी ग्रहण करता है।'

अन्न में तीन कोश हैं- स्थूल, सूक्ष्म व कारण। स्थूल में स्वाद एवं भार, सूक्ष्म में प्रभाव एवं गुण तथा कारण कोश मे अन्न का संस्कार रहता है। मांस आदि अनेक अभक्ष्य पदार्थ ऐसे हैं जो जीह्वा को स्वादिष्ट लगते हैं, देह को मोटा बनाते हैं पर उनमें सूक्ष्म संस्कार ऐसा होता है जो अन्नमय कोश को विकृत कर देता है और उसका परिणाम अदृश्य रूप से आकस्मिक रोगों के रूप मे तथा जन्म-जन्मांतर तक एवं शारीरिक अपूर्णता के रूप मे चलता रहता है। इसी प्रकार अनीति से उपार्जित धन या पाप की कमाई प्रत्यक्ष में आकर्षण लगने पर भी अन्नमय कोश को दूषित करती है और अंत मे शरीर को विकृत एवं चिर रोगी कर देती है।

शारीरिक पोषण मे जो प्रभाव खाद्य पदार्थों मे पाये जानें वाले रासायनों का होता है ठीक वैसा ही उदरस्थ करनें वाले के मन संस्थान पर भावनात्मक प्रभाव उन विशेषताओं का पड़ता है जो आहार के उत्पादन से लेकर परोसनें की मध्यवर्ती प्रक्रिया के साथ किसी न किसी रूप मे जुड़े रहते है। इन्ही व्यक्तियों की भली बुरी विशेषतायें उस आहार के साथ अदृश्य रूप से जुड़ी रहती हैं और खाने वाले को उसी दिशा मे मोड़ती हैं।

आदर्श आहार के तीन मुख्य गुण-

1. मितभुक्   -  भूख से कम खाना

2. हित्भुक्    -   सात्विक खाना

3. ऋत्भुक्     -  न्यायोपार्जित खाना

भोजन

वह पदार्थ (ठोस एवं तरल) जिनको कोई व्यक्ति अथवा प्राणी अपने मुख द्वारा ग्रहण करता है तथा शरीर में जाकर शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं में खर्च होने वाली ऊर्जा की कमी को पूरा करता है भोजन कहलाता है।

Chambers Dictionary के अनुसार भोजन को निम्न रूप से समझा जा सकता है-

1. भोजन वह है जो व्यक्ति खाता है।
2. भोजन वह है जो पचाया जा सके।
3. भोजन वह है जो वृद्धि प्रोन्नति करता है।
अर्थात वे पदार्थ जो शरीर में ग्रहण करने के पश्चात् ऊर्जा उत्पन्न करते हो, नये तन्तुओं का निर्माण तथा टूटे-फूटे तन्तुओं की मरम्मत करते हो तथा शरीरिक क्रियाओं पर नियत्रण तथा शरीर के लिए आवश्यक यौगिकों के बनाने में सहयोग प्रदान करते हैं, भोजन कहलाते हैं।
(Chambers Dictionary का अर्थ है Rules for Regulating diet अर्थात आहार नियंत्रण नियम )
कोई भी वह पदार्थ जो निम्नलिखित में से एक अथवा अधिक गुण रखता हो उसे हम भोजन की संज्ञा दे सकते है-
1) भोज्य पदार्थ के तत्व पाचक रसों में घुलकर रक्त प्रवाह में मिलने की योग्यता रखते हों।
2) भोज्य पदार्थ के तत्व पाचक एन्जाइमों द्वारा विखण्डित होने की योग्यता रखते हो।
3) भोज्य पदार्थ शरीर को पोषित करने की योग्यता रखता हो।
आवश्यक नहीं कि एक ही भोज्य पदार्थ सभी गुण रखते हो जैसे सैकरीन (Saccharin) पाचक रसो द्वारा घुलकर रक्त प्रवाह में पहुँच जाती है किन्तु शरीर के पोषण में उसका कोई योगदान नहीं होता है।

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